शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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इच्छा प्रबल हो उठती है । इस श्रुतुमें केवल उन्हींका चित्त हर्षित और उत्कण्ठित नहीं हो सकता, जो संसारसे उदासीन या पुंसत्त्व-विहीन हैं ।
दोहा ।
पीन एयोवरकों धरत, प्रगट धरत है काम ।
पावस अरु प्यारी निरख, हर्षित होत तमाम ॥४१॥
41. Who does not feel pleasure in the rainy season which has all the qualities of a young woman, gives rise to amorous desires, bears the smell of blossomed jessamine flowers and has swollen heavy clouds over it?
—३—
वियदुपचितमेव भूमयः कन्दलिन्यो ।
नवकुटजकदम्बामोदिनो गन्धवाहाः ॥
शिविकुलकलकेकारावरम्पा वतान्ताः
सुखिनमसुखिनं वा सर्वमुत्कण्ठयन्ति ॥४२॥
मेवोंसे आच्छादित आकाश, नवीन-नवीन अंकुरोंसे पूर्ण पृथ्वी, नवीन कुटज और कदम्बके फूलोंसे सुगन्धित वायु और मेलोंके सुगन्धकी मनोहर वाणीसे रमणीय वनप्रान्त,—वर्षामें, सुखी और दुखी दोनों तरहके पुरुषोंको उत्कण्ठित करते हैं ॥४२॥
खुलासा—हर शब्द सका मन चाहे वह सुखी हो चाहे दुखी, धनधोर घटाओं, नये-नये अंकुरोंसे छायी पृथ्वी एवं कुटज और