भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १५७ )

जनोंको बड़ा क्लेश होता है। देखिये महाकवि कालिदास कहते हैं —

बलाहकाश्चाशनिशब्दमहलाः

सुरेन्द्रचापं दक्षतस्तद्विदुगुणम् ।

सुतीक्ष्णधारा-पतनोप्रसायका—

स्तुदति चेतः प्रसभं प्रवासिनाम् ॥

इन दिनों, ब्रजके शब्दरूपी नगाड़ेवाले बिजलीकी डोरीसे युक्त इन्द्रधनु धारण किये, तीव्र धाराके वृष्टि-रूपी भयंकर वाणवाले ( वीर ) बादल प्रवासियोंके चित्तको बरबस व्यथित कर देते हैं।

यह तो हुई पुरुषोंकी बात ; अब ज़रा परदेशमें रहनेवालोंकी प्राणव्यारियोंके दुःख और कष्टकी बात भी सुनिये :—

विलोचनेन्दीवर—वारि—विन्दुभि—

निषिक्त—विम्बाधर—चारुपल्लवाः

निरस्त माल्याभरणानुलेपनाः

स्थिता निराशाः प्रमदाः प्रवासिनाम् ॥

वर्षामें, विदेशमें रहनेवालोंकी स्त्रियाँ अपने नयन-कमलोंके जलविन्दुओंसे अपने विम्बाफलके समान-सुन्दर अधर-पल्लवों—छोटों—को भिगोये, हार प्रभृति गहने और चन्दन आगर प्रभृतिका अनुलेपन त्यागे, पतिके आनेकी आशा छोड़ ( मनमारे ) बैठी हुई हैं।

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