शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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दोहा ।
घटा घोर चढ़ मोर गिरि, शोह हरित सब भूम ।
विरही व्याकुल पथिकको, कहाँ तोष लखि घूमि ॥४३॥
सार—विरही स्त्री-पुरुषोंको जिस तरह वसन्तमें घोर मनोवेदना और व्यथा होती है ; उसी तरह वर्षामें भी उनको विरहाग्नि की तीव्र ज्वालामें जल-जल कर मछली की तरह तड़फना पड़ता है ।
43. How can a poor traveller feel pleasure (in the rainy season) when the thick clouds gather above, the peacocks dance on the mountain on both sides and the earth is white with new sprouts sprinkling with rain water? (He feels his loneliness and the absence of his beloved wife.)
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इतो विद्युद्गुल्मीविलासितमितिः केतकित्रोः
स्फुरद्गन्धः पोषज्जलदनिनदस्फूर्जितमितिः ।
इतः केकिकीडाकलकलरवः पद्मलहशं
कथं यास्यन्त्येते विरहदिवसाः संश्रुतरसाः ॥४४॥
एक ओर चपलाका चमाचम चमकना, दूसरी ओर केतकीके फूलोंकी मनोहर सुगंध ; एक ओर मेघकी गर्जजन और दूसरी ओर