भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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मोरोंका शोर,—ये सब जहाँ एकत हैं, वहाँ सुनयनी विरह-व्याकुला खिंघा अपने रस-पूर्ण विरहके दिनोंको कैसे वितायेंगी ! ॥४४॥

खुलासा—आकाशमें घनघोर घटाये घिर आई हैं ; बिजली भस्माभ्रम कर रही है, बादलोंकी भयंकर गर्जना हो रही है, केतकीके मनोहर फूलोंकी सुगन्ध उड़ रही है, मतवाले मोर शोर कर रहे हैं ; हाय ! कामकला-प्रवीण सुनयनी तरुणियोंके, ये कामवासनाको बढ़ानेवाले दिन किस तरह कटेंगे ? क्योंकि उनके प्राणवल्लभ घरों पर नहीं हैं । जब वे अंधेरी रातोंमें बादलोंकी हृदय दहलानेवाली आवाजों और बिजलीकी भयंकर कड़कसे भयभीत होंगी, तब कौन उन्हें छातीसे लगाकर उनका भय मिटावेगा ? जब वे चारों ओर कामोद्दीपन करनेवाले सामान देखकर काम-पीड़ित होंगी, तब कौन उनकी काम-शान्ति करेगा ?

दोहा ।

दमकत दामिनि मेष इत, केतकि-पुष्प-विकाश ।

मोर शोर निशिदिन करत, विरहीजन मन त्रास ॥४४॥

सार—वर्षामें प्रवासी पतियोंकी पतिव्रता स्त्रियोंके दिन बड़ी ही मुसीबतमें कटते हैं ।

44. How would the women separated from their lovers pass those wet days when there is the flash of lightening here and the