शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १४६ )
महलकी साफ छत,—ये सब, गरमीके मौसममें, मद और मदन दोनों हीको बढ़ाते हैं ॥३८॥
खुलासा—भूगनयनीके कमल-समान हाथोंमें अरराजा चन्दन लगा है, फुहारें छूट रहे हैं, फूलों की शय्या बिछी है, चन्द्रमा की चाह चाँदनी छिटक रही है, बीणा बज रहा है, चतुर गवैये गा रहे हैं, महल की स्वच्छ और परिष्कृत छत पर पलंग बिछा रहा है—इस सब सामग्रीसे मद और मदन दोनों की वृद्धि होती है ; अर्थात् जिन पुरुषोंके मनमें विषय-वासना नहीं होती, उनके भी मन इन सामानोंके सामने होनेसे उत्कटित हो जाते हैं ; पर ये सब धनी और राजा महाराजाओं को ही मयस्सर हो सकते हैं । हम अपने पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ चन्द्र सुन्दर-सुन्दर श्लोक महा-कवि कालिदास छत “ऋतुसंहार” से उद्धृत करते हैं :—
( १ )
सचन्दनाम्बु-व्यजनोदभवानिलैः सहारयष्टिस्तनमण्डलापैषैः । सवलुकी-काकलिगीत निस्वनेः प्रवृष्यते सुत इवाद्य मन्मथः ॥८॥
( २ )
निशाः शशांकः क्षतनीरराजयः कचिद् विचित्रं जलवैत्रमन्दिरम्