शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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कामी पुरुषोंके मनमें अत्यन्त क्रोध करती है ; किन्तु विषय-वासना-से विमुख पुरुषोंके हृदयोंमें किसी प्रकारका क्रोध उत्पन्न नहीं करती ॥ ४० ॥
खुलासा—जो अनुरागी हैं—कामी है, उनके दिलोंमें स्वच्छ महल, निर्मल सुधाकर की रश्मियाँ, पुष्पमाला, खसके पट्टों की हवा, फव्वारोंका चलना, चन्द्रनकी रज, वीणाका मधुर स्वर, सुरीले कण्ठोंका मनोहर गान प्रभृति शीतल, पर कामोत्तेजक, पदार्थ एक प्रकारकी हलचलसी मचा देते हैं । इनसे उनकी काम-वासना—भोगविलास की इच्छा और भी प्रबल हो जाती है ; परन्तु जो संसारसे उदासीन हैं, जिन्हें विरक्ति हो गई है, जिन्हें संसार की असास्ता और चञ्चलताका ज्ञान हो गया है, उनके दिलोंमें इन सब कामोत्तेजक पदार्थोंसे कुछ भी हलचल नहीं मचती । उनके लिये तो स्वच्छ महल और श्मशान, चाँदनी रात और घोर अँधेरीरात, पुष्पमाला और सर्पमाला, चन्द्रन की रज और श्मशान की राख तथा कामिनियोंकी जुलके और भयंकर कालसर्प प्रभृति सब बराबर हैं ।
दोहा ।
शशिबदनी अरु शरद शशि, चन्द्रन-पुष्प-सुगन्ध ।
ये रसिकनके चित हस्त, सन्तनके चित वन्ध ॥४०॥
सार—चारु चाँदनी, चन्द्रमुखी प्रिया एवं