भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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दोहा ।

तबही लों मन मान यह, तब ही लों भ्रमंग ।

जों लौँ चन्दनसे मिल्यो, पवन न परसत भ्रंग ॥३२॥

सार—मलयपवनके चलते ही मानिनी स्त्रियाँ आप ही सीधी हो जाती हैं ।

32. The pride of a woman before her lover remains only so long as the pure spring air bearing the sweet smell of sandal does not touch her body,

कार्यात्ति स्त्रियां अपने पतिपूर्ति अकृसर विरक्त, उदासीन, नाराज् वा असन्तुष्ट रहती है । जिन पुरुषोंको स्त्री-मूलकी झरत हो, उन्हें उपरोक्त कारण यथासाध्य दूर करनेकी चेष्टा करनी चाहिये । ऐसा करने से ही स्त्री वाहने लगेगी ।