भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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घटाओंके छा जानेसे शीघ्र ही मान छोड़, अपने प्रीतमकी गोदमें आ जाती है। जो कामिनी पुरुषकी अनेक तरहकी खुशामदोंसे भी राजी न होती हो, वह मलयपवन प्रभृतिकी मददसे सहजमें राजी हो जाती है। कविने ठीक कहा है कि, मानिनीका मान तभी तक है, जब तक मलयाचलकी हवा नहीं चलती। उसके चलते ही मानिनी आप खुशामद करने लगती है; क्योंकि वसन्त में मलयाचलकी ओरकी हवा चलती है और वह स्त्रियोंके दिलोंमें बड़ी गुदगुदी पैदा करती है। इसीसे आयुर्वेद-आचार्योंने वसन्त में रात-दिन स्त्री-पुरुषोंके अङ्गमें कामदेवका रहना लिखा है। इस मौसममें, मनहूससे मनहूसका भी काम जाग उठता है और रुटी हुई * स्त्रियाँ सहजमें मन जाती हैं।

❁ कामशास्त्रमें स्त्रीके नाराज या उदासीन रहनेके सम्बन्धमें लिखा है— कार्पण्यादतिमानरोगविरहोद्योगादि पारुष्यतो, मालिन्यासममञ्जतादि भयतः शोकाहृद्भिद्रादिपि। भर्तृषां तनुतादिभिश्च वपुषः काठिन्यतःशंकता, ह्योषाणाञ्च वृथा प्रयाति वनितावैराग्यमुच्यैः सदा ॥

पतिकी प्रत्यन्त कंजूसी, पतिका त्रिषादा प्यार करके सिर पर चढ़ो लेना, पतिका सदा रोगी बना रहना, पतिका मिलह या पुरुषार्थाहीन होना; पतिका उग्र, यौवन, विद्या, बुद्धि और कुल-शौल आदिमें पत्नीके समान न होना; पतिकी मूर्खता, पति और सास-सखर आदिका प्रत्यन्त भय, शोक, दरिद्रता, पतिके शरीरको सख्खो और कठोरता, पतिका अधिक शंकायुत रहना और व्यभिचार या झिगालेकी भूटी बुद्धमत लगाना—प्रवृत्ति