भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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स्त्री-जाति बड़ी ही साहसी होती है । डरती है, तब तो एक चूहेकी खड़खड़से डरकर पतिका छातीसे चिपट जाती है और जब उसे अपने पति या यारके पास जाना होता है, तब सब विघ्न-बाधाओं और आफतोंको तुच्छ समझकर, धोर अँधेरी रातमें, भयंकर श्मशानमें भी पहुँचती है । किसी पाश्चात्य विद्वान्ने ठीक ही कहा है—“A woman when she either loves or hates, will dare anything.” स्त्री जब प्रेम या घृणा—दो मेंसे एक पर तुल जाती है, तब वह सब कुछ कर सकती है ।

महाकवि कालिदास कहते हैं :—

अभीदणमुच्छैर्धनता पयोमुचा वनान्वकारीकृतशर्वीश्वपि । तद्विप्रमादर्शितमार्गभूयः प्रयाति रागादभिसारिकाः स्त्रियः ॥

वयामें, धोर गर्जन करनेवाले मेघोंसे रातके अत्यन्त अँधेरी होने पर भी, अभिसारिका स्त्रियाँ, अपनी राहकी ज़मीनको बिजलीके प्रकाशसे देखती हुई, बड़े चावसे, अपने यारोंके पास जा रही हैं ।

दोहा ।

महा अन्धतम नभ जलद, दामिनि दमक दुरात । हर्ष-शोक दोज करत, तियको पिय-दिग जात ॥४५॥

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