भारतकोश
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शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( १६१ )

स्त्री-जाति बड़ी ही साहसी होती है । डरती है, तब तो एक चूहेकी खड़खड़से डरकर पतिका छातीसे चिपट जाती है और जब उसे अपने पति या यारके पास जाना होता है, तब सब विघ्न-बाधाओं और आफतोंको तुच्छ समझकर, धोर अँधेरी रातमें, भयंकर श्मशानमें भी पहुँचती है । किसी पाश्चात्य विद्वान्ने ठीक ही कहा है—“A woman when she either loves or hates, will dare anything.” स्त्री जब प्रेम या घृणा—दो मेंसे एक पर तुल जाती है, तब वह सब कुछ कर सकती है ।

महाकवि कालिदास कहते हैं :—

अभीदणमुच्छैर्धनता पयोमुचा वनान्वकारीकृतशर्वीश्वपि । तद्विप्रमादर्शितमार्गभूयः प्रयाति रागादभिसारिकाः स्त्रियः ॥

वयामें, धोर गर्जन करनेवाले मेघोंसे रातके अत्यन्त अँधेरी होने पर भी, अभिसारिका स्त्रियाँ, अपनी राहकी ज़मीनको बिजलीके प्रकाशसे देखती हुई, बड़े चावसे, अपने यारोंके पास जा रही हैं ।

दोहा ।

महा अन्धतम नभ जलद, दामिनि दमक दुरात । हर्ष-शोक दोज करत, तियको पिय-दिग जात ॥४५॥

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( १६२ )

सार—वर्षाकी घोर अंधेरी रातमें, वक्त मुकरर पर, अपने यारोंके पास जानेवाली अभि-सारिका नारियोंको दुःख और सुख दोनों ही होते हैं ।

45. In the pitch darkness of the month of Shravana, the loud roaring of the clouds in the sky, falling of rains with hailstones and the golden flash of lightning, give pain and pleasure to a woman thinking of her husband who is travelling on the way.

—*—

असारेण न हर्म्यतः प्रियतमैयातुं वहिः शक्यते शीतोत्कम्पनिमित्तायतदृशा गाढं समालिङ्ग्यते ॥

जाताः शीतलशीकराश्च मरुतो वानुत्यन्तवेदच्छिदो

धन्यानां वत दुर्दिनं सुदिनतां याति प्रियासंगमे ॥४६॥

वर्षाकी भड़ीमें प्रियतम घरसे बाहर निकल नहीं सकते । जोड़े के मारे कौपती हुई विशाल नेत्रोंवाली प्राणप्यारी स्त्रियाँ उनको आलिङ्ग करती हैं और शीतल जलके कणों सहित वायु मैथुनके अन्तमें होनेवाले श्रमको मिटा देते हैं—इस तरह वर्षाके दुर्दिन भी भाग्यवानोंके लिये सुदिन हो जाते हैं ॥४६॥

खुलासा—वर्षाकालमें बाज़-बाज़ वक्त, ऐसी भड़ी लग जाती है, कि हफ्तों सूर्यके दर्शन नहीं होते । वैसे दिनोंमें, भाग्यवान

श्रीरामायणक

वधा के मंझे में नियतम घर से बाहर जा नहीं सकते। जाड़े के मारे कौफो हईं स्त्रियाँ उन्हें आलिङ्गन करती हैं। इस तरह वधा के दुर्दिन भी मायवजानों को सुदिन हो जाते हैं।

Popular Press—Calcutta.

(पृष्ठ १०८)

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( १६३ )

लोग, दिन निकल आने पर भी, घरसे बाहर नहीं जाते—अपने पलंगों पर ही पड़े रहते हैं। उनकी भुगनयनी खियाँ, जाड़ेके मारे काँपती हुई, उन्हें अपनी छातियोंसे ढगा लेती हैं और मेह की फुहारोंसे मिली हुई शीतल हवा उनकी मैथुनकी थकानको मिटा देती है। जिन्होंने पूर्वजन्ममें पुण्य किया है, उनको वर्षाके बुरे दिन भी इस तरह सुखदाई हो जाते हैं। पुण्यवानों को दुःखमें सुख और जड़लमें मझूल होता है।

क्षप्य ।

प्राविट् वर्षत मेह, चट्पौ दिन शीत अधिकतर । बाहर नहि कठि सकत, नेह सौं परा कोउ नर ॥ क्रम्य होत जब गात, तबहि प्यारी संग सेवत । उठत अंग-तरंग, अंगमें अंग समोवत ॥ रत-वेद-स्वेद छेदन करत, जालरन्ध्रे श्वात पवन । इहि विधि दुर्दिक्स हू मोदप्रद, होवहि तिय-संग बसि भवन ॥

सार—पुण्यवानोंको वर्षाके दुर्दिन भी, अपनी प्राणप्यारियों की सुहृत्तमे, सुदिन हो जाते हैं।

46. On a rainy day, the lover cannot come out of his house and the long eyed lady shivering with cold embraces fast her husband ; the cold wind blows carrying with it small particles of water that takes away the fatigue arising from copulation. Surely, even

( १६४ )

the evil days of a fortunate man become good in the company of beloved wife,

—**—

शरद-महिमा ।

अर्द्धं नीत्वा निशायः सरभसुरतावासखिन्नश्लथंगः मोदभूतासद्यतृष्णो मधुमदनिरतो हर्म्यगृहे विविकं ॥ संभोगकान्तकान्ताशियिलधुजलतातर्जितं कर्करीतो ज्योत्स्नाभिन्नाच्छवारंपिवतितनसलिलंशारदंमन्दभाग्यः ॥४७॥

आधी रात बीतने पर, जल्दी-जल्दी मैथुन करके थक जाने पर और उसीकी वजहसे असह्य प्यास लगने पर, मदिरेके नशे की हालतमें, महलकी स्वच्छ छत पर बैठा हुआ पुरुष, यदि मैथुनके कारण थकी हुई भुजाओंवाली प्यारीके हाथोंसे लाई हुई भारीका निर्मल जल, शरदकी चाँदनीमें नहीं पीता, तो वह निश्चय ही अभागा है ॥४७॥

व्यप्य ।

व्यके मदनकी व्याक, सुदित मदिरेके व्याके । करत सुरत रण रंग, जंग कर कहु-इक थाके ॥

( १६५ )

पौढ रहै लिपटाय, अंग अंगनमें उरमे । बहुत लगी जब प्यास, तबहिँ चित चाहत सुरमे ॥ उठ पियत रात आधी गये, शीतल जल या शरदको । नर पुरयवन्त फल लेत हैं, निज सुकतहिंकी फरदको ॥४८॥

सार--- शरद की चाँदनी रातमें, मैथुनसे थकी हुई कामिनोके हाथोंका लाया हुआ जल भाग्यवान् ही पीते हैं ।

47. He is surely unfortunate who after the midnight being quite exhausted by speedy copulation, feeling very thirsty and being intoxicated with wine, does not drink the cool and pure autumn water bright as moonlight from the brassy pot on the lonely roof of the palace, brought by the weak hands of his wife, who is also tired on account of copulation.

हेमन्त-महिमा ।

हेमन्ते दधिद्वयसर्पिरचना माञ्जिष्ठवासोभूतः कार्मीन्द्रवसान्द्रदिग्धवपुषः खिन्ना विचित्रै रतैः । पीनोरःस्थलकामिनीजनकृताश्लेषा गृहाभ्यान्तरं तांबूलीदिलपूषपूरितमुखा धन्याः सुखं रोते ॥४८॥

( १६६ )

हेमन्त ऋतुमें जो दही, दूध और घी खाते हैं ; मँजीठके रंगमें रंगे हुए वस्त्र पहनते हैं ; शरीरमें केसर का गाढ़ा-गाढ़ा लेप करते हैं ; आसन-भेदसे अनेक प्रकार मैथुन करके सुखी होते हैं ; पृष्ठ जाँचों और सघन कठोर कुचोंवाली स्त्रियोंका गाढ़ आलिङ्गन करते हैं और मसालेदार पानका बीड़ा चबाते हुए मकानके भीतरी कमरेमें सुखसे सोते हैं, वे निश्चय ही भाग्यवान् हैं ॥४८॥

महाकवि कालिदास-रचित भी एक श्लोक पढ़िये :—

पुष्पासवामोदसुगन्धवक्त्रो, निःश्वासवतीः सुरभीकृतांगः ।

परस्परगव्यतिषंगशायी, शेतै जनः कामशरानुविद्धः ॥

हे प्यारी ! इस हेमन्त ऋतुमें, कामार्त्ता स्त्री-पुरुष फूलोंकी शराबकी गन्धसे मुँहको और अपने श्वासवायुसे अङ्गोंको सुगन्धित किये, परस्पर लिपटे हुए सोते रहते हैं ।

सोराडा ।

दही दूध घृत पान, वसन मजीठहि रंगके ।

आलिगन रति दान, केसर चर्चि हिमन्तमें ॥४९॥

48. Blessed is the man who, in the winter, eats the food rich with milk, curd and ghee, wears clothes coloured in scarlet-red Manjistha, besmears his body thickly with paste of saffron and musk, is embraced by a woman with swollen breasts after being exhausted by various kinds of sexual intercourse and with his mouth full of betels, sleeps happily in his house.

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शिशिर-महिमा ।

जुवनतो गंडभितीरलकवति मुखे सीत्कृतान्यादधाना वक्षःस्तर्कजुकेषु स्तनभरणुलकोद्भेदमापादयन्तः ॥ उरुनाकंपयंतः प्रयुजयनतटातुलंसयंतौशुकानि व्यक्तं कांताजनानां विट्चरितकृतः शैशिरा वांति वाताः ॥४६॥

स्त्रियोंके केशयुक्त गालोंको चूमता हुआ, जोरके जाड़ेके मारे उनके मुँह से “सी-सी” कराता हुआ, ब्रँगी-रहित खुले हुए स्तनोंको रेमाण्डित करता हुआ, पेड़ोंको कँपाता हुआ और पुष्ट जोंबोसे कपड़ा हटाता हुआ, शिशिरका वायु जर पृथ्वीका सा आचरण करता हुआ वह रहा है ॥४६॥

खुलासा—पति स्त्रीके साथ जो-जो काम करता है, शिशिर का वायु भी वही सब काम करता है। पति गालोंको चूमता है, शिशिरका वायु भी बालोंको इधर-उधर करता हुआ गालोंको चूमता है। पति मैथुनके आनन्दमें मग्न करके स्त्रीके मुँहसे “सी-सी” कराता है; उसी तरह शिशिरका वायु भी जाड़ेकी अधिकताके मारे उनके मुखोंसे “सी-सी” कराता है। पुरुष

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स्तनों को रोमाञ्चित करता है ; शिशिर-वायु भी वही करता है । पुरुष स्त्रीकी जाँघों से कपड़ा हटाता है, शिशिर-वायु भी जाँघों से वस्त्र हटाता है । बहुत क्या—शिशिरका वायु हर तरह स्त्रियोंके साथ पतियोंका सा आचरण करता है—पराई स्त्रियोंको दिन-दहाड़े बेखटके भोगता है ।

व्यप्यय ।

तुम्बन करत कपोल, मुखहि सीत्कार करावत । हृदय मैंहि घसि जात, कुचन पर रोम बरावत ॥ जंघनको थहरात, वसन हू दूर करत झुक । लग्यो रहत संग मैंहि, द्वारको रोक रखौं डुक ॥ यह शिशिर पवन विटरूप धर, गलिन-गलिन भटकत भिरत । मिल रहे नारि नर घरनमें, चाकी भटमेर न भिरत ॥४९॥

सार—शिशिर ऋतुका वायु, पराई स्त्रियों के साथ, जारोंका सा काम करता है ।

49. The wind in the winter season blows behaving itself like a lustful man at the time of copulation, it causes the hair of the breast which is without any jacket to stand on end, it kisses the face with flowing hairs and with shivering sounds in the mouth just as one hears at the time of copulation, shaking the thighs and making the clothes of hips and loins to fly about.

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( १६६ )

केशानाकलयन्द्शो मुकुलयन्वासो बलादाक्षिप-

त्रातन्वनुलकोद्गर्भं प्रकट्यन्नालिंग्य कम्पञ्छनैः ।

वारम्बारमुदारसीत्कृतकृतोदन्तच्छदानृपीडय-

नृपायःशैशिर एष संपति भरुत्कांतासु कांतायते ॥५०॥

वालोंको वखेरता, आँखोंको कुछ-कुछ मूँदता, साड़ीको जोरसे उड़ाता, देहको रोमाञ्चित करता, शरीरमें सनसनी पैदा करता, काँपते हुए शरीरको आलिंगन करता, बारम्बार सी-सी कराकर होठों को चूमता हुआ, शिशिरका वायु पतियोंका सा आचरण करता है ॥५०॥

खुलासा—शिशिर-वायु स्त्रियोंके साथ बेहया, मस्त अथवा शहवतपरस्त पतियोंका सा काम करता है ।

व्यप्य ।

विलुलित करत सुकेश, नयन हूँ छिन-छिन मूँदत ।

वसनन ऐसे लेत, देह रोमाञ्चन रूँदत ॥

करत हृदयको कम्प, कहत मुखहूँ सों तीसी ।

पीड़ा करतहि होठ, वयारहुँ बार सिरिसी ।

यह शीतकालमें जानिये, अद्भुत गति धारन पवन ।

पनिशि-चौस दुरे दुबके रहो, निज नारी संग निज भवन ॥५०॥

50 The air in the winter season acts like a husband in the case of women by scattering their hairs, shutting their eyes, forcibly

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removing their upper garments, causing the hair stand on end, slowly shaking the body by touch and giving pain to the lips by their continuous shivering sounds.

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असारः सन्त्वेते विरतिविरसायासविषया ।

गुण्यन्तां यद्वा ननु सकलदोषास्पदमिति ॥

तथाप्यन्तस्तत्त्वे प्रणिहितविद्यामप्यतिबल—

स्तदीयोऽन्नाख्येयः स्फुरतिहृदयेकोऽपिमहिमा ॥५१॥

“सांसारिक विषय-भोग असार, विरतिमें विश्व करनेवाले और सब दोषोंकी खान हैं”—इत्यादि निन्दा लोग भले ही करें ; फिर भी इनकी महिमा अपार है और इनके शक्तिशाली होनेमें कोई सन्देह नहीं , क्योंकि ब्रह्मविचारमें लीन तत्त्ववेत्ताओंके हृदयमें भी ये प्रकाशित होते हैं ॥५१॥

खुलासा—यद्यपि संसारी विषय-भोग असार और शोथे हैं, हमारे वैराग्य या संसार-त्यागमें बाधक हैं, सभी दोषोंके मूल कारण हैं, जीवका सब तरहसे अनहित करते हैं, मनुष्यको निर्लज्ज और मति-हीन करते एवं ज्ञानको धो बहाते हैं। इतने दोष होने पर भी, कहना पड़ता है कि, ये बड़े ही शक्तिशाली और अपार महिमावान् हैं। इनकी शक्ति और सामर्थ्यका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। क्योंकि जिन्होंने संसार त्याग दिया है, जो दिवारात मूलकारणकी खोजमें लगे रहते हैं, उन

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तत्त्ववेत्ता ब्रह्मज्ञानियोंके हृदयमें भी ये कामाग्नि सन्दीपन कर देते हैं।

छप्यय ।

यद्यपि भोग निस्सार, विरतिमें विघ्न करें नित ।

सब दोषनकी खानि, जीवको साथें अनहित ॥

कैं निलज मतहीन, ज्ञानकू घोय बहावैं ।

सर्वस देहिं नसाय, बुरो जग बीच कहावैं ॥

यदि निन्दा याकी करें कोउ, तद्यपि है महिमा बहुत ।

हिय वसत नक्षत्रानीहुँके, तहँ पामरकी गिनतीहि कुत ॥५१॥

सार—संसारी विषय-भोग अत्यन्त वलवान हैं । औरोंकी तो क्या चलाई, ये संसार-त्यागी ब्रह्मज्ञानियोंके हृदयोंमें भी कामाग्नि प्रज्वलित कर देते हैं ।

51. If these objects of pleasure be unsubstantial or such as may take us far from abandoning the world and if the people blame them thinking them to be the seat of all vices, yet great and indescribable is their power in as much as they conquer even those who have attained high spiritual knowledge.

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भवन्तो वेदान्तप्रणहितधियामासगुरवो विदग्धालापानां वयमपि कवीनामखुराः ॥

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तथाप्येतद्भूमौ न हि परहितात्पुण्यमधिकं न चास्मिन्संसारे कुवल्यष्टशो रम्यमपरम् ॥५२॥

आप वेदान्तवेत्ताओंके माननीय गुरु हो और हम उत्तम काव्य- रचयिता कविओंके सेवक हैं ; तोभी हमें यह बात कहनी ही पड़ती है कि, परोपकारसे बढ़कर पुण्य नहीं है और कमलनयनी सुन्दरी स्त्रियों से बढ़कर और सुन्दर पदार्थ नहीं है ॥५२॥

खुलासा—आप वेदान्त-पारङ्गत पण्डितोंके मान्य गुरु हैं। आपमें अपार विद्या-बुद्धि है। हम कुछ पढ़े-लिखे विद्वान् नहीं, केवल काव्यशास्त्र-विनोदी कवीश्वरोंके अनुचर हैं। तोभी ; हमें अपनी समझके अनुसार कहना पड़ता है कि, इस जगत्में “परो- पकार” से उत्तम पुण्य नहीं है और “भूमनयनी कामिनियों” से बढ़कर दूसरी सुन्दर वस्तु नहीं है। इसलिये बुद्धिमानोंको, धन उपार्जन करके, तन-मन-धनसे परोपकार-पुण्य सम्बन्ध करना और सुखोचना कामिनियोंके साथ भोग-विलास करना चाहिये। संसारमें रहने वालोंके लिये ये दोनों ही परमोत्तम कर्म हैं। हाँ, जिनका दिल इस नापायेंदार दुनियासे उदास या खट्टा हो गया है, उनकी बात दूसरी है।

छप्पय ।

पढ़े वेद-वेदान्त, भंये विद्योदधि पारा । तिनहूँके तुम गुरु, बुद्धिवल पाय अपारा ॥

( १७२ )

हम कछु जानत नाहिं, पढ़े नाहिं विद्या भारी ।

रहे कविनके दास, कहैं ये बात विचारी ॥

यह जग बिच परउपकार-सम, अपर कछु है पुराय नाहिं ।

अरु पकंजनयनी विथन सों, वस्तु अधिक नहीं सुखद कहि ॥५२॥

सार--परोपकारसे बढ़कर पुराय नहीं है और स्त्री-भोगसे बढ़कर सुख नहीं है ।

52. If you are the respected preceptor of Vedantists, I am also the follower of poets who take delight in beautiful epic poems. Nevertheless, know it for certain that in this world, there is no higher virtue than doing good to others and nothing more beautiful than a lotus-eyed woman.

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किमिह बहुभिरुक्तैर्मुक्तिशून्यैः प्रलपै-

द्रव्यमिहयुरुषाणां सर्वदा सेवनीयम् ॥

अभिनवमदलीलालालसं सुंदरीणां

स्तनभरपरिखिन्नं यौवनं वा वनं वा ॥५३॥

युक्तिशून्य कृथा प्रलापसे तो क्या प्रयोजन ? इस जगत्में दो ही वस्तुएँ सेवन करने योग्य हैं—(१) नवीन मदान्व्य लीलाभि- लक्षिणी और स्तनभारसे खिन्न सुन्दरी स्त्रियोंका यौवन, अथवा (२) वन ॥५३॥

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खुलासा—वाहियात और बे-सिर पैर की बकवादेसे कोई फ़ायदा नहीं। हमारी समझमें तो इस जगत्में दो ही चीज़ें पुरुषोंके सेवन करने योग्य हैं :—( १ ) नवयौवना स्त्रियाँ, अथवा ( २ ) वन।

यदि मनुष्य संसारत्यागी न होना चाहे, संसारमें ही रहना चाहे, इस दुनियाके विषय-भोग भोगना चाहे ; तो कमलनयनी नवयौवनाओंके यौवन की बहार लूटे। चाहे इनका आनन्द अनित्य और परिणाममें दुःखमूलक ही है ; पर संसारियोंके लिये, इस संसारमें, इनसे बढ़कर दूसरी चीज़ ही नहीं।

देखिये रसिक-शिरोमणि पण्डितेन्द्र जगन्नाथ महाराज कहते हैं :—

तया तिलोत्तमीयत्या मुगशावकचक्षुषा।

ममाऽयं मानुषो लोको नाकलोक इवाभवत् ॥

उस तिलोत्तमा नामक अप्सराके समान आचरण करनेवाली मुगशावकनयनीके कारणसे मेरा यह मृत्युलोक स्वर्गलोकके समान हो गया है।

सच है, जिसके घरमें अप्सरा-समान नवयुवती है, उसे इस पृथ्वी पर ही स्वर्ग है। स्वर्गमें इससे बढ़कर और क्या रक्खा है ? कारलाइल महोदय कहते हैं :—“If in youth the universe is majestically unveiling and everywhere heaven revealing itself on earth, nowhere

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to the young man does this heaven on earth so immediately reveal itself as in the young maiden." यदि यौवनमें विश्व गौरवके साथ अपने तर्ज प्रकट करता है, यदि स्वर्ग पृथ्वी पर प्रादुर्भूत होता है, तो युवकके लिये स्वर्गका प्रादुर्भाव युवतीमें ही होता है; अन्यत्र नहीं।

किनतु इनमें रहकर आगे-पीछे का सभी ख्याल भुला देना भला नहीं, इनको भोगो और अवश्य भोगो; कोई क्षति नहीं; पर अपनी आगेकी यात्राका ध्यान ज़रूर रखो; क्योंकि यहाँ का मुकाम थोड़े ही दिनोंका है। जो अपनी आगेकी सफर के लिये भी पहलेसे ही प्रबन्ध करते हैं, उन्हें जो स्वर्गीय सुख यहाँ मिल रहे हैं, वह आगे भी मिलेगा। यहाँ स्वर्ग भोगा और मरने पर नरकमें डाले गये, इसमें तो चतुराई नहीं। इसलिये संसारियों के लिये स्त्री-भोगके साथ पुण्य-सञ्चय भी करते जाना चाहिये। सब तरहके पुण्योंमें परोपकार सर्वश्रेष्ठ पुण्य है, इस लिये यही करना उचित है। जो अपनी ही नवयौवना के साथ भोग-विलास करेंगे और साथ-साथ परोपकार पुण्य भी सञ्चय करेंगे, उन्हें कोई भय नहीं। वे तपस्वियोंके तपस्वी समझे जायेंगे और उन्हें अगले जन्ममें फिर स्वर्ग-सुख-दायिनी कमलनेत्री सुन्दरिष्टाँ मिलेंगी। यदि वे स्वर्गलोकमें जन्म लेने तो वहाँ भी हरे या अग्नराये मिलेंगी; पर बिना पुण्य सञ्चयके वे यहाँ मिलेंगी न वहाँ। कहा है:—

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क्या वह दुनिया, जिसमें कोशिश हो न दीं के वास्ते । वास्ते ढाँके भी कुछ—या सब यहींके वास्ते ॥ जौँक ॥

इस संसारमें आकर कुछ परलोक बनाने की भी फिक करनी चाहिये । यह उचित नहीं, कि उधर की फिक बिल्कुल ही छोड़ दी जाय ।

नाम मंजूर है, तो फैंजके असबाब बना ।

पुल बना, चाह बना, मसजिदो तालाब बना ॥ जौँक ॥

अगर तू चाहता है कि, तेरा नाम संसारमें प्रतिष्ठा के साथ लिया जाय, तो तू परोपकार कर ; पुल बना, कूप बना, मन्दिर और तालाब बना ।

अब रही उनकी बात; जो इस संसारकी असारतासे वाकिफ हो गये हैं, जिनका मन विषय-भोगोंसे हटसा गया है, जिन्हें विषय-विषासे घृणा हो गई है, उन्हें सच्चे दिल से विषयों को त्याग देना चाहिये ; मनमें भी—कभी भूल कर भी—विषयोंका ध्यान न करना चाहिये । ऊपरसे संन्यासी बनना और भीतर विषयोंकी चाह रखना, बहुत ही खराब है ।

मनमें एक बात स्थिर कर लेनी चाहिये । इस जगत्में स्थिर-बुद्धिका ही सदा भला होता है ; चञ्चल-बुद्धिका सर्वनाश होता है । बुद्धिको स्थिर करके किसी एक बात पर जम जाना चाहिये । बाहे भोग हो भोगे जायँ अथवा योग ही साधा जाय । रसिक कवि ने खूब कहा है—

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दोहा ।

रसिक सुनहु तुम कान दे, सब ग्रन्थनको सार ।

योग भोगमें इक बिना, यह संसार असार ॥

सुनो औरहू बात पै, सुख्य बात ये दोष ।

कै तिय-जोवनमें रमै, कै बनवासी होय ॥५३॥

सार—मनुष्योंको या तो नवीनायें भोगनी चाहियें अथवा संसारके भगड़े छोड़, वनमें जा, तप करना चाहिये ।

53. What is the use of so much unreasonable wild talk ? There are only two things which a person should always desire enjoyment of,—viz (i) the youth of a beautiful lady who is desirous of new amorous enjoyments and is bent down under the load of her breasts or (ii) the forest.

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सत्यं जना वचिम् न पक्षपाताख्येकु सर्वेषु च तथ्यमेतत् ।

नान्यन्मनोहारि नितम्बिनीभ्यो दुःखैकहेतुर्न च कश्चिदन्त्य ॥५४॥

हे मनुष्यो ! हम पक्षपात त्यागकर सच कहते हैं कि, इस संसारमें स्त्रियोंसे बढ़कर न कोई मनको हरनेवाली वस्तु है और न कोई दुःखदायी वस्तु है ॥५४॥

खुलासा—इस जगत्में, सुख और दुःख दोनों ही का कारण

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एकमात्र मनोहर नितम्बोंवाली स्त्री है। औरभी स्पष्ट शब्दोंमें यों कह सकते हैं कि, स्त्री ही सुख देनेवाली और स्त्री ही दुःख देनेवाली है ; यानी सुख और दुःख दोनोंका हेतु एकमात्र स्त्री ही है। पाश्चात्य लोगोंमें एक कहावत है कि स्त्री, सम्पत्ति और सुरा,—इन तीनोंमें दुःख और सुख दोनों ही हैं।

नित्यन्देह, इस जगत्में, पुरुषके लिये स्त्रीसे बढ़कर सुख-दायी और मनोहर दूसरी वस्तु नहीं। स्त्री अपने मधुर बचनों, सुन्दर हाव-भाव और उत्तम सेवासे पुरुषके शारीरिक और मानसिक क्लेशोंको शीघ्र ही हर लेती है। स्त्री विपद्में सच्चे मित्रकी तरह परामर्श देती और धैर्य धारण कराती है। और सब विपद्में पुरुषको त्याग देते हैं, पर यह अपने पतिको नहीं त्यागती। भोजनके समय, जिस हित और प्रेमसे ये खिलाती-पिलाती है ; उस तरह, सिवा जननीके, और कोई भी नहीं खिलाता-पिलाता। सम्मोषण-कालमें, यह, वेश्याकी तरह, अपने पतिका सब तरहसे मनोरञ्जन करती है। इतनाही नहीं, उसके वंश की वृद्धि भी करती है ; यानी स्त्रीसे ही पुत्र पौत्रादि होते हैं। मनुष्य कैसा ही दुःखित क्यों न हो, स्त्री घरमें आते ही उसके सारे खेद और श्रमको हर लेती तथा उसे नरकसे बचाती और स्वर्गमें ले जाती है। स्त्रीसे ही राम, ऋषण, भगीरथ, ध्रुव, प्रह्लाद, अर्जुन, भीम, बुद्ध, शङ्कराचार्य, दयानन्द और गौधी जैसे महा-पुरुष पैदा हुए और होते हैं ; अतः यह स्पष्ट है कि, स्त्रीके समान सुखदायी इस जगत्में दूसरी चीज नहीं। मनोहर यह