भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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to the young man does this heaven on earth so immediately reveal itself as in the young maiden." यदि यौवनमें विश्व गौरवके साथ अपने तर्ज प्रकट करता है, यदि स्वर्ग पृथ्वी पर प्रादुर्भूत होता है, तो युवकके लिये स्वर्गका प्रादुर्भाव युवतीमें ही होता है; अन्यत्र नहीं।

किनतु इनमें रहकर आगे-पीछे का सभी ख्याल भुला देना भला नहीं, इनको भोगो और अवश्य भोगो; कोई क्षति नहीं; पर अपनी आगेकी यात्राका ध्यान ज़रूर रखो; क्योंकि यहाँ का मुकाम थोड़े ही दिनोंका है। जो अपनी आगेकी सफर के लिये भी पहलेसे ही प्रबन्ध करते हैं, उन्हें जो स्वर्गीय सुख यहाँ मिल रहे हैं, वह आगे भी मिलेगा। यहाँ स्वर्ग भोगा और मरने पर नरकमें डाले गये, इसमें तो चतुराई नहीं। इसलिये संसारियों के लिये स्त्री-भोगके साथ पुण्य-सञ्चय भी करते जाना चाहिये। सब तरहके पुण्योंमें परोपकार सर्वश्रेष्ठ पुण्य है, इस लिये यही करना उचित है। जो अपनी ही नवयौवना के साथ भोग-विलास करेंगे और साथ-साथ परोपकार पुण्य भी सञ्चय करेंगे, उन्हें कोई भय नहीं। वे तपस्वियोंके तपस्वी समझे जायेंगे और उन्हें अगले जन्ममें फिर स्वर्ग-सुख-दायिनी कमलनेत्री सुन्दरिष्टाँ मिलेंगी। यदि वे स्वर्गलोकमें जन्म लेने तो वहाँ भी हरे या अग्नराये मिलेंगी; पर बिना पुण्य सञ्चयके वे यहाँ मिलेंगी न वहाँ। कहा है:—