भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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खुलासा—वाहियात और बे-सिर पैर की बकवादेसे कोई फ़ायदा नहीं। हमारी समझमें तो इस जगत्में दो ही चीज़ें पुरुषोंके सेवन करने योग्य हैं :—( १ ) नवयौवना स्त्रियाँ, अथवा ( २ ) वन।

यदि मनुष्य संसारत्यागी न होना चाहे, संसारमें ही रहना चाहे, इस दुनियाके विषय-भोग भोगना चाहे ; तो कमलनयनी नवयौवनाओंके यौवन की बहार लूटे। चाहे इनका आनन्द अनित्य और परिणाममें दुःखमूलक ही है ; पर संसारियोंके लिये, इस संसारमें, इनसे बढ़कर दूसरी चीज़ ही नहीं।

देखिये रसिक-शिरोमणि पण्डितेन्द्र जगन्नाथ महाराज कहते हैं :—

तया तिलोत्तमीयत्या मुगशावकचक्षुषा।

ममाऽयं मानुषो लोको नाकलोक इवाभवत् ॥

उस तिलोत्तमा नामक अप्सराके समान आचरण करनेवाली मुगशावकनयनीके कारणसे मेरा यह मृत्युलोक स्वर्गलोकके समान हो गया है।

सच है, जिसके घरमें अप्सरा-समान नवयुवती है, उसे इस पृथ्वी पर ही स्वर्ग है। स्वर्गमें इससे बढ़कर और क्या रक्खा है ? कारलाइल महोदय कहते हैं :—“If in youth the universe is majestically unveiling and everywhere heaven revealing itself on earth, nowhere