भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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हम कछु जानत नाहिं, पढ़े नाहिं विद्या भारी ।

रहे कविनके दास, कहैं ये बात विचारी ॥

यह जग बिच परउपकार-सम, अपर कछु है पुराय नाहिं ।

अरु पकंजनयनी विथन सों, वस्तु अधिक नहीं सुखद कहि ॥५२॥

सार--परोपकारसे बढ़कर पुराय नहीं है और स्त्री-भोगसे बढ़कर सुख नहीं है ।

52. If you are the respected preceptor of Vedantists, I am also the follower of poets who take delight in beautiful epic poems. Nevertheless, know it for certain that in this world, there is no higher virtue than doing good to others and nothing more beautiful than a lotus-eyed woman.

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किमिह बहुभिरुक्तैर्मुक्तिशून्यैः प्रलपै-

द्रव्यमिहयुरुषाणां सर्वदा सेवनीयम् ॥

अभिनवमदलीलालालसं सुंदरीणां

स्तनभरपरिखिन्नं यौवनं वा वनं वा ॥५३॥

युक्तिशून्य कृथा प्रलापसे तो क्या प्रयोजन ? इस जगत्में दो ही वस्तुएँ सेवन करने योग्य हैं—(१) नवीन मदान्व्य लीलाभि- लक्षिणी और स्तनभारसे खिन्न सुन्दरी स्त्रियोंका यौवन, अथवा (२) वन ॥५३॥