शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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तथाप्येतद्भूमौ न हि परहितात्पुण्यमधिकं न चास्मिन्संसारे कुवल्यष्टशो रम्यमपरम् ॥५२॥
आप वेदान्तवेत्ताओंके माननीय गुरु हो और हम उत्तम काव्य- रचयिता कविओंके सेवक हैं ; तोभी हमें यह बात कहनी ही पड़ती है कि, परोपकारसे बढ़कर पुण्य नहीं है और कमलनयनी सुन्दरी स्त्रियों से बढ़कर और सुन्दर पदार्थ नहीं है ॥५२॥
खुलासा—आप वेदान्त-पारङ्गत पण्डितोंके मान्य गुरु हैं। आपमें अपार विद्या-बुद्धि है। हम कुछ पढ़े-लिखे विद्वान् नहीं, केवल काव्यशास्त्र-विनोदी कवीश्वरोंके अनुचर हैं। तोभी ; हमें अपनी समझके अनुसार कहना पड़ता है कि, इस जगत्में “परो- पकार” से उत्तम पुण्य नहीं है और “भूमनयनी कामिनियों” से बढ़कर दूसरी सुन्दर वस्तु नहीं है। इसलिये बुद्धिमानोंको, धन उपार्जन करके, तन-मन-धनसे परोपकार-पुण्य सम्बन्ध करना और सुखोचना कामिनियोंके साथ भोग-विलास करना चाहिये। संसारमें रहने वालोंके लिये ये दोनों ही परमोत्तम कर्म हैं। हाँ, जिनका दिल इस नापायेंदार दुनियासे उदास या खट्टा हो गया है, उनकी बात दूसरी है।
छप्पय ।
पढ़े वेद-वेदान्त, भंये विद्योदधि पारा । तिनहूँके तुम गुरु, बुद्धिवल पाय अपारा ॥