भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १७६ )

क्या वह दुनिया, जिसमें कोशिश हो न दीं के वास्ते । वास्ते ढाँके भी कुछ—या सब यहींके वास्ते ॥ जौँक ॥

इस संसारमें आकर कुछ परलोक बनाने की भी फिक करनी चाहिये । यह उचित नहीं, कि उधर की फिक बिल्कुल ही छोड़ दी जाय ।

नाम मंजूर है, तो फैंजके असबाब बना ।

पुल बना, चाह बना, मसजिदो तालाब बना ॥ जौँक ॥

अगर तू चाहता है कि, तेरा नाम संसारमें प्रतिष्ठा के साथ लिया जाय, तो तू परोपकार कर ; पुल बना, कूप बना, मन्दिर और तालाब बना ।

अब रही उनकी बात; जो इस संसारकी असारतासे वाकिफ हो गये हैं, जिनका मन विषय-भोगोंसे हटसा गया है, जिन्हें विषय-विषासे घृणा हो गई है, उन्हें सच्चे दिल से विषयों को त्याग देना चाहिये ; मनमें भी—कभी भूल कर भी—विषयोंका ध्यान न करना चाहिये । ऊपरसे संन्यासी बनना और भीतर विषयोंकी चाह रखना, बहुत ही खराब है ।

मनमें एक बात स्थिर कर लेनी चाहिये । इस जगत्में स्थिर-बुद्धिका ही सदा भला होता है ; चञ्चल-बुद्धिका सर्वनाश होता है । बुद्धिको स्थिर करके किसी एक बात पर जम जाना चाहिये । बाहे भोग हो भोगे जायँ अथवा योग ही साधा जाय । रसिक कवि ने खूब कहा है—