भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( १७६ )

क्या वह दुनिया, जिसमें कोशिश हो न दीं के वास्ते । वास्ते ढाँके भी कुछ—या सब यहींके वास्ते ॥ जौँक ॥

इस संसारमें आकर कुछ परलोक बनाने की भी फिक करनी चाहिये । यह उचित नहीं, कि उधर की फिक बिल्कुल ही छोड़ दी जाय ।

नाम मंजूर है, तो फैंजके असबाब बना ।

पुल बना, चाह बना, मसजिदो तालाब बना ॥ जौँक ॥

अगर तू चाहता है कि, तेरा नाम संसारमें प्रतिष्ठा के साथ लिया जाय, तो तू परोपकार कर ; पुल बना, कूप बना, मन्दिर और तालाब बना ।

अब रही उनकी बात; जो इस संसारकी असारतासे वाकिफ हो गये हैं, जिनका मन विषय-भोगोंसे हटसा गया है, जिन्हें विषय-विषासे घृणा हो गई है, उन्हें सच्चे दिल से विषयों को त्याग देना चाहिये ; मनमें भी—कभी भूल कर भी—विषयोंका ध्यान न करना चाहिये । ऊपरसे संन्यासी बनना और भीतर विषयोंकी चाह रखना, बहुत ही खराब है ।

मनमें एक बात स्थिर कर लेनी चाहिये । इस जगत्में स्थिर-बुद्धिका ही सदा भला होता है ; चञ्चल-बुद्धिका सर्वनाश होता है । बुद्धिको स्थिर करके किसी एक बात पर जम जाना चाहिये । बाहे भोग हो भोगे जायँ अथवा योग ही साधा जाय । रसिक कवि ने खूब कहा है—

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दोहा ।

रसिक सुनहु तुम कान दे, सब ग्रन्थनको सार ।

योग भोगमें इक बिना, यह संसार असार ॥

सुनो औरहू बात पै, सुख्य बात ये दोष ।

कै तिय-जोवनमें रमै, कै बनवासी होय ॥५३॥

सार—मनुष्योंको या तो नवीनायें भोगनी चाहियें अथवा संसारके भगड़े छोड़, वनमें जा, तप करना चाहिये ।

53. What is the use of so much unreasonable wild talk ? There are only two things which a person should always desire enjoyment of,—viz (i) the youth of a beautiful lady who is desirous of new amorous enjoyments and is bent down under the load of her breasts or (ii) the forest.

—❧—

सत्यं जना वचिम् न पक्षपाताख्येकु सर्वेषु च तथ्यमेतत् ।

नान्यन्मनोहारि नितम्बिनीभ्यो दुःखैकहेतुर्न च कश्चिदन्त्य ॥५४॥

हे मनुष्यो ! हम पक्षपात त्यागकर सच कहते हैं कि, इस संसारमें स्त्रियोंसे बढ़कर न कोई मनको हरनेवाली वस्तु है और न कोई दुःखदायी वस्तु है ॥५४॥

खुलासा—इस जगत्में, सुख और दुःख दोनों ही का कारण

१२

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एकमात्र मनोहर नितम्बोंवाली स्त्री है। औरभी स्पष्ट शब्दोंमें यों कह सकते हैं कि, स्त्री ही सुख देनेवाली और स्त्री ही दुःख देनेवाली है ; यानी सुख और दुःख दोनोंका हेतु एकमात्र स्त्री ही है। पाश्चात्य लोगोंमें एक कहावत है कि स्त्री, सम्पत्ति और सुरा,—इन तीनोंमें दुःख और सुख दोनों ही हैं।

नित्यन्देह, इस जगत्में, पुरुषके लिये स्त्रीसे बढ़कर सुख-दायी और मनोहर दूसरी वस्तु नहीं। स्त्री अपने मधुर बचनों, सुन्दर हाव-भाव और उत्तम सेवासे पुरुषके शारीरिक और मानसिक क्लेशोंको शीघ्र ही हर लेती है। स्त्री विपद्में सच्चे मित्रकी तरह परामर्श देती और धैर्य धारण कराती है। और सब विपद्में पुरुषको त्याग देते हैं, पर यह अपने पतिको नहीं त्यागती। भोजनके समय, जिस हित और प्रेमसे ये खिलाती-पिलाती है ; उस तरह, सिवा जननीके, और कोई भी नहीं खिलाता-पिलाता। सम्मोषण-कालमें, यह, वेश्याकी तरह, अपने पतिका सब तरहसे मनोरञ्जन करती है। इतनाही नहीं, उसके वंश की वृद्धि भी करती है ; यानी स्त्रीसे ही पुत्र पौत्रादि होते हैं। मनुष्य कैसा ही दुःखित क्यों न हो, स्त्री घरमें आते ही उसके सारे खेद और श्रमको हर लेती तथा उसे नरकसे बचाती और स्वर्गमें ले जाती है। स्त्रीसे ही राम, ऋषण, भगीरथ, ध्रुव, प्रह्लाद, अर्जुन, भीम, बुद्ध, शङ्कराचार्य, दयानन्द और गौधी जैसे महा-पुरुष पैदा हुए और होते हैं ; अतः यह स्पष्ट है कि, स्त्रीके समान सुखदायी इस जगत्में दूसरी चीज नहीं। मनोहर यह

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इतनी होती है कि, अपनी एक मुसक्यानमें ही पुरुषका मन हर लेती है। पर ये सब सुख तभी मिलते हैं, जब कि स्त्री सती-साध्वी और सच्ची पतिव्रता होती है। यही स्त्री अगर कुलट्ठा-व्यभिचारिणी अथवा कर्कशा होती है; तो पुरुषके लिये यहीं-इसी लोकमें—साक्षात् नरक हो जाता है। पर सच्ची पतिव्रता किसी विरले ही पुण्यात्मा को मिलती है।

जिसे पतिव्रता स्त्री मिलती है, उसे दुःख-दैन्य, आपद्-मुसीबत और शोक-चिन्ता प्रभृति सता नहीं सकते; क्योंकि पतिव्रता नरकको स्वर्गमें, दुःखको सुखमें, विपद्को सम्पदमें और शोकको हर्षमें परिणत कर देनेकी क्षमता रखती है। वह घरके काम-काज करती, पुत्र-कन्याओंको पालती, उन्हें सुशिक्षा देती और कुपथगामी पतिको सुपथगामी बना देती है। पुरुषकी कड़ी कमाई का पैसा बड़ी ही किफायतसे खर्च करती और उसे नष्ट होनेसे बचाती तथा पतिका शोक हर लेती है। स्त्रियोंके सम्बन्धमें गोल्डस्मिथ महोदयने, जो ईंग्लैण्डके एक नामी विद्वान् थे, खूब कहा है। हम अपने पाठकोंके ज्ञानवर्द्धनार्थ आपके अनमोल वचन नीचे देते हैं:—“Women, it has been observed, are not naturally formed for great cares themselves, but to soften ours” यह देखा गया है, कि स्त्रियाँ भ्रष्ट चिन्ताओंको खय सहनेके लिये नहीं; वरन् हमारी चिन्ताओंको घटानेके लिये बनाई गई हैं। आपने एक जगह लिखा है:—“She who makes her husband and her

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children happy, who reclaims the one from vice and trains up the other to virtue, is a much greater character than ladies described in romance, whose whole occupation is to murder mankind with shaft from their quiver or their eyes.” जो अपने पति और बच्चोंको सुखी कर सकती है, जो अपने ख़विन्दको कुमार्गसे हटाकर सुमार्ग पर चला सकती है, जो अपने बालकों को सदगुणोंकी शिक्षा दे सकती है, वह कल्पित कथाओं या उपन्यासोंमें वर्णित उन स्त्रियोंसे अच्छी है, जो अपने तरकश या नेत्रोंके वाणों द्वारा मानवजातिको बध करना ही अपना कर्तव्य समझती है।

संसारमें रूपका आदर है। रूप प्राणिमात्रको अपनी ओर खींचता है, पर रूपसे गुणकी पूजा अधिक होती है। रूप नेत्रेन्द्रियको प्रसन्न करता है; पर गुण आत्मा पर अधिकार जमाता है। पोप महाशय कहते हैं—“Beauties in vain their pretty eyes may roll, charms strike the sight but merit wins the the soul.” सुन्दरियाँ वृथा ही अपने सुन्दर नेत्रोंको इधर-उधर चलाती हैं। सौन्दर्यका प्रभाव नेत्रोंपर पड़ता है, किन्तु गुण आत्माको जीत लेता है। मतलब यह, कि रूपवती और गुणवती रमणी कहीं भली होती है; पर जिसे ईश्वरने ऐसी नारी दी है, जिसमें रूपके साथ सुन्दर गुणोंका भी समावेश है, वह निश्चय ही पूर्व जन्मका तपस्वी

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और पुण्यात्मा है। उसे इसी पृथ्वी पर ही स्वर्ग है। लेकिन जिसकी स्त्री फूहर और कर्कशा है, घरको मैला रखती है, बच्चों को सूरगले रखती है, खाना बनाना भी नहीं जानती, मनमें आवे जैसी कच्ची-पक्की जली-अधजली रोटियाँ खिलाती है, हर घड़ी मुँह कुलाये रहती है, घरमें देवासुर-संग्रामका तमाशा दिखाया करती है, उस पुरुषके लिए यहीं नरक है। किसी कविने खूब कहा है :—

भातको मांड करै नहिँ रौँड, औं सौगुनो साँभर सागमें डारे। भूल के खाँड ले डारत दालमें, हींग कुलायके खीर बवारै। चाकते रोटी हु मोटी करै, औं काचीही रखेकि जारही डारे। भूतसी भौनमें ठाडी रहै, परमेश्वर ऐसी सों पालो न पारे॥

अर्थात् जो स्त्री भातका माँड़ नहीं पसाती, सागमें सौगुना नमक डालती है, भूलकर दालमें चीनी मिला देती है, खीरमें हींगका छोंक देती है, कुम्हारके चाक-जैसी मोटी रोटियाँ करती है, उन्हें कच्ची रखती या जला डालती है, और भूतनीसी घरमें खड़ी रहती है, परमेश्वर ऐसी खीसे पाला न पड़े। जिनपर

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ईश्वरका कोप होता है या किसीका शाप होता है, उन्हें ही ऐसी फूहर ली मिलती हैं। कहा है—

जानो दारुण शापफल, मिलहि दुष्ट जिहि नारि ।

यद्यपि पतिव्रता नारी सुखोंका भण्डार है ; तोभी स्त्री सती हो चाहे असती, पतिव्रता हो चाहे व्यभिचारिणी, स्त्रीके कारण पुरुषको नाना प्रकारके कष्ट उठाने ही पड़ते हैं। स्त्रीके लिये ही वह स्वास्थ्य और जीवनका खयाल न रखकर भी, रात-दिन, अविरत परिश्रम करता है। स्त्रीके लिये ही पुरुष दुर्जनोके कुबचन सहता, उनको हाथ जोड़ता, उनके कदम पकड़ता और न करने योग्य कर्म करता है। बहुत कहाँ तक कहें, स्त्रीके लिये पुरुष नीच-से-नीच कर्म करता, जेल जाता और फाँसी चढ़ता है। अगर इस जगत्में चन्द्रानना कमलनयनी कामिनियाँ न होतीं, तो कौन बुद्धिमान् राजाओं और अमीरोंकी सेवामें अनेक प्रकारके कष्ट उठाकर अधीर-चित्त होता ?

यह सब तो पुरुष स्त्रीकी मोह-मायामें फँस स्वयं करता और स्वयं दुःख भोगता है। पर यदि दुर्भाग्यसे स्त्री कुलटा होती है, तब तो वह घरमें ही नाना प्रकारके कष्ट और यन्त्रणायें भुगाती है। कुलटा कामिनीका शरीर यदि पुष्पवत् कोमल भी होता है ; तो उसका हृदय वज्रवत् कठोर होता है। उसके दिलमें दया-माया और स्नेह नामको भी नहीं होता। वह सच्ची पिशाचिनी होती है। शम्बरासुर और विचित्रिकी मायाको समझना सहज है, पर कुलटाकी मायाको समझना कठिन

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है। वह अबला दीखने पर भी सबला और गौ होने पर भी बाध होती है। वह निरङ्कुश होकर पुरुषको नाना प्रकारसे नचाती और सेवककी तरह उससे काम कराती है। बुधा विलास-बिह् दिखाकर उससे पैर दबवाती और अपनी इच्छा होनेसे उसका रक्त-मांस चूसती है। जरासी फरमायश पूरी न होनेसे और घरकी एक चीज़ भी समय पर न आनेसे उसके प्राण ले लेती और उसके कलेजेको वाक्यवाणीसे विद्ध करके चलनी बना देती है। बहुत कहाँ तक कहें, नरकके दुःख कुलटाके दिये दुःखाँके सामने लजा जाते हैं।

सारांश यही है, कि अगर स्त्री नवयौवना, रूपवती और पतिव्रता हो, तो पुरुषको जो कष्ट उठाने पड़ते हैं, उनसे उसे उतना कष्ट या मनोवेदना नहीं होती। वह स्वयं बाहरके कष्टों को हर लेती है। पर पतिव्रताके होने पर भी, पुरुष कष्ट और अपमानसे बच नहीं सकता। इसलिये, इसमें शक नहीं कि, स्त्री सुख और दुःख दोनों ही की हेतु है, यानी स्त्रीसे सुख भी है और दुःख भी है। सुख थोड़ा और नाम मात्रको है और वह भी अज्ञानीके लिये। ज्ञानी और विरागीकी नज़रमें तो दुःख-ही-दुःख है; इसलिये जिन्हें कष्ट और भंभटोंसे बचना हो, जिन्हें आत्माका कल्याण करना हो, वे इस मनोहर विष-बेलसे बचें। फोन्टेनेली महोदय कहते हैं :—“A beautiful woman is the “hell” of the soul, the “purgatory” of the purse and the “paradise” of the eyes.” सुन्दरी कामिनी

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आत्माका नरक, सम्पत्तिका नाश और नेत्रोंकी स्वर्ग हैं। गिरि- धर कविराय कहते हैं :—

कुण्डलिया ।

तीनों मूल उपाधिकी, जूँ जोरू जामीन । है उपाधि तिसके कहीं, जाके नहिं ये तीन । जाके नहिं ये तीन, हृदयमें नाहिन इच्छा । परम सुखी सो साधु, खाय यद्यपि लै भिक्षा ॥ कह गिरिधर कविराय, एक आत्मरस भीनो । निर्मय बिचै सन्त, सर्वथा तजकर तीनों ॥

दोहा ।

कहाँहिं सत्य तज पक्ष हम, लोक-विमोहन नारि । श्रुत या सों दुखद अपर, नहिं कछु लेहु बिचारि ॥५४॥

सार—स्त्रीसे बढ़कर सुखदायी और दुख- दायी और कोई नहीं ।

54. O men, I tell you the truth and without any partiality that, in this world, there is nothing so attractive to the mind as the women and again, nothing so painful also.

—*

तावेदेव ऋतिनामपि स्फुरत्येष निर्मलविवेकदीपकः १

तावेदेव न कुरंगचतुर्णां ताव्यते चपललोचनाञ्चलैः ॥५५॥

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विवेकियोंके हृदयमें निर्मल विवेकरूपी दीपकका प्रकाश तभीतक रहता है, जबतक कि मुगनयनी स्त्रियोंके चञ्चल नेत्र रूपी आँचलसे वह बुझाया नहीं जाता ॥५५॥

खुलासा—अन्तःकरणमें कामादि मल रहित निर्मल विवेक का दीपक उसी समय तक जलता है, जब तक कि मुगलोचना के चञ्चल नेत्र रूपी आँचलकी फटकार नहीं लगती। और भी स्पष्ट शब्दोंमें यों कह सकते हैं कि, स्त्रियोंके कटाक्षसे विवेकी पुरुषोंका भी विवेक ध्वंस हो जाता है। “भामिनी-विलास” में लिखा है :—

तदवधि कुशलीपुराणशास्त्रस्मृति- शतचारुविचारजो विवेकः ।

यदवधि न पदं दधाति चित्ते हरिण- किशोरहंशो दृशोर्विलासः ॥

कुशलता और पुराण-शास्त्र तथा स्मृतियोंके अनेक चारु विचारोंसे उत्पन्न हुआ विवेक तभी तक है, जब तक मुगकेसे बच्चेकी आँखोंवाली कामिनीके नेत्र-विलास हृदयमें प्रवेश नहीं करते ; अर्थात् स्त्रीकी तीखा नज़र पड़ते ही विवेक और चतुराई सब काफूर हो जाते हैं।

उस्ताद जौक भी कुछ पेसी ही बात कहते हैं :—

ऐ जौक ! आज सामने उस चश्मे मस्तके। बातिल सब अपने दाब-ये दानिशवरी हुए ॥

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ऐ ज्ञौक ! उसकी मदनमत्त मनोहर आँखके सामने आज हमारी योग्यता और बुद्धिमत्ताका अन्त हो गया ।

सब है, जब तक चञ्चल नेत्रोंवाली कामिनीकी नज़रसे नज़र नहीं मिलती, तभी तक विवेक, बुद्धि और विचारोंका अस्तित्व समझिये । उसकी नज़रसे नज़र मिलते ही इनका क्षातमा हो जाता है ।

दोहा ।

दीपक जरत विवेकको, तों लों या चित माहिं ।

जों लों नारि-कटाक्ष-पट, पवनसु परसत नाहिं ॥५५॥

साँर—मृगनयनी नवयुवतीसे चार नज़र होते ही विवेक और बुद्धि सब हवा हो जाते हैं ।

55. The light of reasoning flickers in the heart of a wise man only so long as it is not put out by the moving eyes of a lotus-eyed woman as if by a scarf.

—*

वचसि भवति संगत्यागमुद्दिश्य वातां

श्रुतिमुखरसुखानां केवलं पण्डितानाम् ॥

जघनमरुणरन्ध्रिकाञ्चीकलापं

कुवलयनयनानांको विहातुं समर्थः ॥५६॥

शास्त्रवक्ता पण्डितोका व्री-त्यागका उपदेश केवल कथनमात्र

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ही है । लाल रत्न-जटित करधनीवाली कमलनयनी त्रिगोत्री मनोहर जंवाब्रोंको कौन त्याग सकता है ? ॥५६॥

खुलासा—पाण्डित्यका ढकोसला दिखाने वाले पण्डित वास्तवमें स्त्री-त्यागका उपदेश नहीं देते ; खाली अपना पाण्डित्य दिखानेके लिये ज्ञवानसे बकते हैं । वे गोस्वामी तुलसी दासकी इस कहावतके अनुसार “परोपदेश कुशल बहुतेरे, आप चलहिं ऐसे नर न घनेर” लोगोंको उपदेश भर ही देते हैं, आप खुद अमल नहीं कर सकते । वे किसी ललित ललनाके कटाक्षवर्णोंसे विद्व नहीं हुए हैं, इसीसे बातें बनाते हैं ; जब स्वयं उन पर पड़ेगी, तब सब शास्त्रोंको भूल जायँगे । महाकवि दागने ऐसो ही के लिए कहा है :—

दिललगी दिललगी नहीं नासह ! तेरे दिलको यभी लगी ही नहीं ॥

उपदेशकजी ! दिललगी दिललगी नहीं है, उसी समय तक आप इसे दिललगी समझते हैं, जब तक कि आपके दिलको लगी नहीं है । अगर किसीसे दिल लगा, तो आपका सारा पाण्डित्य हवा हो जायगा ।

सौन्दर्य्य मामूली चीज़ नहीं ; ऐसा कौन है, जिसे सौन्दर्य्य अपनी ओर न खींच सके ? मिश्रर कलेण्डन कहते हैं—“A beautiful object doth attract the sight of all men, that it is no man's power not to be pleased with

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it. सुन्दर पदार्थमें मनुष्यमात्रकी दृष्टिको आकर्षित करने की इतनी प्रबल शक्ति है कि, कोई भी मनुष्य उससे प्रसन्न हुए बिना रह नहीं सकता। सुन्दरता मनुष्यके दिमागमें चढ़ जाती और उसे नशेसे मस्त कर देती है। देखनेवालेका दिल वशमें नहीं रहता। जिम्मेरमैन महोदयने ठीक ही कहा है—“Beauty is worse than wine ; it intoxicates both holder and the beholder. “सौन्दर्य शराबसे भी बुरा है। यह उसके रखनेवाले और उसके देखनेवाले दोनोंको मतवाला कर देता है। सुन्दरियोंके सौन्दर्यको देखकर, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेके पूर्ण अभ्यासी भी, अपने मनको वशमें रखनेमें असमर्थ होते हैं। पुराणोंमें लिखा है कि, पूर्वकालमें, मरीचि, शृंगी, विश्वामित्र और पराशर जैसे महामुनि, जो केवल वृक्षोंके पत्ते और हवा भक्षण करके जीते थे, इन मोहिनियोंको सामने पाकर इन्हें त्याग न सके ; तब साधारण लोगोंकी क्या गिन्ती ? शैक्सपियरने कहा है :—“Beauty is a witch against whose charms faith melteth into blood.” सुन्दरता ऐसी जादूगरनी है कि उसके जादूसे धर्म-ईमान गल कर धून हो जाते हैं; यानी रुपये सामने धर्म-ईमान नहीं ठहरता, न जाने कहाँ काफूर हो जाता है ?

कुण्डलिया ।

परिडत-जन जब कहत हैं, तिय तजिबेकी बात । करत वृथा बकवाद वह, तजी नैक नहीं जात ॥

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तजी नैक नहिं जात, गात-छवि कनक वरन वर । कमल-पल-सम नैन, वैन बोलत अमृत भर । सोहत मुख मृदु हास, अंग आभूषण मंडित । ऐसी तियको तजे, कौनसो है वह परिदत ? ॥५६॥

सार—सुन्दरी नवयौवना कामिनी को सामने पाकर त्यागना—खेल नहीं—टेढ़ी खोर है। इसकी निन्दा करनेवाले चाहे अनेक हों, पर त्यागनेवाला एक भी नहीं।

56. It is only in the speeches of the talkative scholars that the abandonment of the company of a woman is advocated but who is strong-minded enough to give up in actual practice the hips of lotus-eyed woman wearing girdle set with red jewels.

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स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योलीकपण्डितो युवतीः ।

यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापि फलं तथाऽप्सरसः ॥५७॥

जो विद्वान् युवतियोंकी निन्दा करता है, वह निश्चय ही भूठा परिदत है। उसने पहले आप धोखा खाया है और अब दूसरोंको धोखा देता है ; क्योंकि अनेक प्रकारकी तपस्याओंका फल स्वर्ग है और स्वर्गका फल अप्सरा-भोग है ॥५७॥

खुलासा—जो विद्वान् परिदत नवयौवना कामिनियोंकी

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निन्दा करते हैं, उनमें अनेक दोष बताते हैं, वे पागल हैं। वे स्वर्गकी प्राप्तिके लिये अनेक प्रकारकी तपश्चर्या और जप-तप करते हैं। तपःसिद्धि होने पर स्वर्गमें जाना चाहते हैं। वहाँ उनको भोगनेके लिये अप्सरायें मिलेंगी ; तब यहीं उनके भोगने में कौनसी बुराई है ? यह तो सीधीसी बात है कि, तपस्याका फल स्वर्ग है और स्वर्गका फल अप्सरायें ।

“आप पाण्डेजी वैशन खावे, औरोंको परमोध बतावे” ऐसे परोपदेशक दुनियाँमें बहुत हैं। आप वही काम करते हैं, पर औरोंको मना करते हैं। ऐसे महापुरुषोंके सम्बन्धमें ही महाकवि दाग कहते हैं :—

हूँके वास्ते जाहिदने इबादतकी है । सैर तो जब है, कि जवतमें न जाने पावे ॥

भक्त महाशयने स्वर्गीय अप्सराओं या हूँको भोगनेके लिये ईश्वरकी उपासना की है। बड़ा मज़ा हो, अगर ये स्वर्गमें जाने ही न पावें ।

महाकवि ज़ौक कहते हैं :—

कब हकपरस्त है, जाहिदे जवतपरस्त है । हूँ रो पै मर रहा है, यह शहवतपरस्त है ॥

कौन कहता है, भक्तजी ईश्वर-उपासक है ? ये तो घोर कामी और इन्द्रिय-दास हैं। स्वर्गकी अप्सराओं पर मर रहे हैं। जो स्वर्गकी कामनासे तप करते हैं, उनकी स्त्री-निन्दा ध्यान देने

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योग्य नहीं ; वे बुथा निन्दा करते हैं। आप स्वर्गमें जाकर स्त्री ही भोगेंगे और करेंगे क्या ? स्वर्गीय अप्सरायें या हरे भी तो आखिर स्त्रियाँ ही हैं न ? ऐसे धोखेबाज़ोंकी बातोंमें न आना चाहिये।

उस्ताद जौकने भी कहा है :—

रेसो सफेद शैल्यमें, है जुस्मते फ़रेब ।

इस मक़ाँदनीपर, न करना गुमान ऐ सुवह ॥

शैखजी की सफेद दाढ़ीमें कपटका अन्धकार छिपा हुआ है। इस भूटी चाँदनी पर प्रातःकालकी सफेदीका धोखा मत खाना ; यानी इनकी बात मान, कामिनियोंको भोगना न छोड़ना। ऐसे घोंघा-बसन्त अपनी सिद्धाई जमानेको कपट से ऐसी बेतुकी बातें कहते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं, जिनको इन नारी-रत्नोंकी क़द्र ही नहीं मालूम ; इससे इनकी निन्दा करते हैं। जिसे जिसकी क़द्र ही नहीं मालूम, वह तो उसकी निन्दा ही करेगा। जंगलमें पड़े हुए गजमेतियोंको भीलनी पाकर भी फँक देती है ; पर उनकी कीमत जाननेवाला जौहरी उन्हें उठा कर छातीसे लगा लेता है। जिसने शराब नहीं पीयी, जिसे शराब का मज़ा नहीं मालूम, वह शराबकी निन्दा ही करता है। उसे कोई लाब समझावे, वह नहीं समझता। ऐसे ही मौक़ेका एक शेर महाकवि दागने कहा है :—

( १६२ )

लुक् मे तुभसे क्या कहूँ जाहिर । हाय ! कम्बल तूने पीही नहीं ॥

हे भक्त ! मैं तुम्हें शराबका मज़ा कैसे बताऊँ ? कम्बल तूने उसे पिया ही नहीं । जो मदिरा पीता है और नाज़नियोंको भोगता है, वही जानता है कि, उनमें क्या मज़ा है । उस मज़ेका हाल ज़बानसे बताना कठिन ही नहीं, असम्भव है । सच मानिये, पृथ्वी पर अगर स्वर्ग है, तो कमलनयनी उठती जवानीकी सुन्दरियाँमें ही हैं ।

दोहा ।

नारिनी निन्दा करत, ते पण्डित मतहीन । स्वर्ग गये तिनको सुनै, सदा अस्सरा लीन ॥४७॥

सार—स्त्रियोंको निन्दा करनेवाला पाखण्डी है । आप उन्हें भोगना चाहता है, पर दूसरों को रोकता है ।

57. Those scholars who speak ill of women are liars in as much as they deceive others and also themselves ; for the result of austerity is heaven and the result of attaining heaven is the enjoy- ment of nymphs.

—*—

मतेभकुम्भदलने भुवि सन्ति शूराः केचित्यचण्डमृगराजवधेऽपि दृत्वा ॥

A black and white photograph showing a close-up of a hand holding the right edge of a blank, off-white page. The hand is positioned on the right side of the frame, with fingers visible. To the right of the page, a dark, textured surface, likely the inner cover or binding of a book, is visible. The page itself is mostly empty, with a few small, dark specks scattered across it. The lighting is bright, creating a high-contrast image.

शुद्धारशतक

मतवाले हाथी का मस्तक विदारनेवाले और बलवान सिंहको मारनेवाले बहुत हैं ; परन्तु कामदेव का गर्व खर्व करनेवाले, स्त्री से हार न खानेवाले कोई मिले ही हैं । इस चित्रमें यह दिखाया गया है

( १६३ )

किं तु त्रवीणि बलिनां पुरतः प्रसह्य

कन्दर्पदर्पदलने विरला मनुष्याः ॥५८॥

इस पृथ्वी पर, मतवाले हाथीका मस्तक विदारनेवाले शूर अनेक हैं, प्रचण्ड मृगराज—सिंहके मारनेवाले भी कितने ही मिल सकते हैं ; परन्तु बलवानोंके सामने हम हठ करके कहते हैं, कि कामदेवके मदको मर्दन करनेवाले पुरुष कोई बिरले ही होंगे ॥५८॥

खुलासा—हाथियों और सिंहोंको पराजित करनेवाले शूर-वीर इस पृथ्वीपर अनेक मिल सकते हैं ; पर कामदेवको वशमें करनेवाला अथवा कामिनीके कटाक्ष-वाणोंसे पराजित न होने वाला, कोई एक भी कठिनसे मिलता है । बड़े-बड़े युद्धक्षेत्रोंमें विजयी होनेवाले शूरवीरोंकी भी शूरवीरता इन कामिनियोंके आगे न जाने कहाँ चली जाती है ? बड़े-बड़े बहादुरोंकी ज़बानसे यही निकलता है—

मर गये हम इक इशारेमें निगाहे नाज़ुके ।

पर वक़ौल स्वामि शंकराचार्यजीके सच्चा शूरवीर वही है, जो मनोज—कामदेवके वाणोंसे व्यथित न हो अर्थात् कामिनीके दाममें न फँसे । कहा है—

यूरान्महाशुरतमोऽस्ति को वा ? ।

मनोजवाणैर्व्यथितो न यस्तु ॥

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