भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १८६ )

तजी नैक नहिं जात, गात-छवि कनक वरन वर । कमल-पल-सम नैन, वैन बोलत अमृत भर । सोहत मुख मृदु हास, अंग आभूषण मंडित । ऐसी तियको तजे, कौनसो है वह परिदत ? ॥५६॥

सार—सुन्दरी नवयौवना कामिनी को सामने पाकर त्यागना—खेल नहीं—टेढ़ी खोर है। इसकी निन्दा करनेवाले चाहे अनेक हों, पर त्यागनेवाला एक भी नहीं।

56. It is only in the speeches of the talkative scholars that the abandonment of the company of a woman is advocated but who is strong-minded enough to give up in actual practice the hips of lotus-eyed woman wearing girdle set with red jewels.

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स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योलीकपण्डितो युवतीः ।

यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापि फलं तथाऽप्सरसः ॥५७॥

जो विद्वान् युवतियोंकी निन्दा करता है, वह निश्चय ही भूठा परिदत है। उसने पहले आप धोखा खाया है और अब दूसरोंको धोखा देता है ; क्योंकि अनेक प्रकारकी तपस्याओंका फल स्वर्ग है और स्वर्गका फल अप्सरा-भोग है ॥५७॥

खुलासा—जो विद्वान् परिदत नवयौवना कामिनियोंकी