भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 225

( १६० )

निन्दा करते हैं, उनमें अनेक दोष बताते हैं, वे पागल हैं। वे स्वर्गकी प्राप्तिके लिये अनेक प्रकारकी तपश्चर्या और जप-तप करते हैं। तपःसिद्धि होने पर स्वर्गमें जाना चाहते हैं। वहाँ उनको भोगनेके लिये अप्सरायें मिलेंगी ; तब यहीं उनके भोगने में कौनसी बुराई है ? यह तो सीधीसी बात है कि, तपस्याका फल स्वर्ग है और स्वर्गका फल अप्सरायें ।

“आप पाण्डेजी वैशन खावे, औरोंको परमोध बतावे” ऐसे परोपदेशक दुनियाँमें बहुत हैं। आप वही काम करते हैं, पर औरोंको मना करते हैं। ऐसे महापुरुषोंके सम्बन्धमें ही महाकवि दाग कहते हैं :—

हूँके वास्ते जाहिदने इबादतकी है । सैर तो जब है, कि जवतमें न जाने पावे ॥

भक्त महाशयने स्वर्गीय अप्सराओं या हूँको भोगनेके लिये ईश्वरकी उपासना की है। बड़ा मज़ा हो, अगर ये स्वर्गमें जाने ही न पावें ।

महाकवि ज़ौक कहते हैं :—

कब हकपरस्त है, जाहिदे जवतपरस्त है । हूँ रो पै मर रहा है, यह शहवतपरस्त है ॥

कौन कहता है, भक्तजी ईश्वर-उपासक है ? ये तो घोर कामी और इन्द्रिय-दास हैं। स्वर्गकी अप्सराओं पर मर रहे हैं। जो स्वर्गकी कामनासे तप करते हैं, उनकी स्त्री-निन्दा ध्यान देने