शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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एकमात्र मनोहर नितम्बोंवाली स्त्री है। औरभी स्पष्ट शब्दोंमें यों कह सकते हैं कि, स्त्री ही सुख देनेवाली और स्त्री ही दुःख देनेवाली है ; यानी सुख और दुःख दोनोंका हेतु एकमात्र स्त्री ही है। पाश्चात्य लोगोंमें एक कहावत है कि स्त्री, सम्पत्ति और सुरा,—इन तीनोंमें दुःख और सुख दोनों ही हैं।
नित्यन्देह, इस जगत्में, पुरुषके लिये स्त्रीसे बढ़कर सुख-दायी और मनोहर दूसरी वस्तु नहीं। स्त्री अपने मधुर बचनों, सुन्दर हाव-भाव और उत्तम सेवासे पुरुषके शारीरिक और मानसिक क्लेशोंको शीघ्र ही हर लेती है। स्त्री विपद्में सच्चे मित्रकी तरह परामर्श देती और धैर्य धारण कराती है। और सब विपद्में पुरुषको त्याग देते हैं, पर यह अपने पतिको नहीं त्यागती। भोजनके समय, जिस हित और प्रेमसे ये खिलाती-पिलाती है ; उस तरह, सिवा जननीके, और कोई भी नहीं खिलाता-पिलाता। सम्मोषण-कालमें, यह, वेश्याकी तरह, अपने पतिका सब तरहसे मनोरञ्जन करती है। इतनाही नहीं, उसके वंश की वृद्धि भी करती है ; यानी स्त्रीसे ही पुत्र पौत्रादि होते हैं। मनुष्य कैसा ही दुःखित क्यों न हो, स्त्री घरमें आते ही उसके सारे खेद और श्रमको हर लेती तथा उसे नरकसे बचाती और स्वर्गमें ले जाती है। स्त्रीसे ही राम, ऋषण, भगीरथ, ध्रुव, प्रह्लाद, अर्जुन, भीम, बुद्ध, शङ्कराचार्य, दयानन्द और गौधी जैसे महा-पुरुष पैदा हुए और होते हैं ; अतः यह स्पष्ट है कि, स्त्रीके समान सुखदायी इस जगत्में दूसरी चीज नहीं। मनोहर यह