भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 212

( १७७ )

दोहा ।

रसिक सुनहु तुम कान दे, सब ग्रन्थनको सार ।

योग भोगमें इक बिना, यह संसार असार ॥

सुनो औरहू बात पै, सुख्य बात ये दोष ।

कै तिय-जोवनमें रमै, कै बनवासी होय ॥५३॥

सार—मनुष्योंको या तो नवीनायें भोगनी चाहियें अथवा संसारके भगड़े छोड़, वनमें जा, तप करना चाहिये ।

53. What is the use of so much unreasonable wild talk ? There are only two things which a person should always desire enjoyment of,—viz (i) the youth of a beautiful lady who is desirous of new amorous enjoyments and is bent down under the load of her breasts or (ii) the forest.

—❧—

सत्यं जना वचिम् न पक्षपाताख्येकु सर्वेषु च तथ्यमेतत् ।

नान्यन्मनोहारि नितम्बिनीभ्यो दुःखैकहेतुर्न च कश्चिदन्त्य ॥५४॥

हे मनुष्यो ! हम पक्षपात त्यागकर सच कहते हैं कि, इस संसारमें स्त्रियोंसे बढ़कर न कोई मनको हरनेवाली वस्तु है और न कोई दुःखदायी वस्तु है ॥५४॥

खुलासा—इस जगत्में, सुख और दुःख दोनों ही का कारण

१२