भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १८४ )

आत्माका नरक, सम्पत्तिका नाश और नेत्रोंकी स्वर्ग हैं। गिरि- धर कविराय कहते हैं :—

कुण्डलिया ।

तीनों मूल उपाधिकी, जूँ जोरू जामीन । है उपाधि तिसके कहीं, जाके नहिं ये तीन । जाके नहिं ये तीन, हृदयमें नाहिन इच्छा । परम सुखी सो साधु, खाय यद्यपि लै भिक्षा ॥ कह गिरिधर कविराय, एक आत्मरस भीनो । निर्मय बिचै सन्त, सर्वथा तजकर तीनों ॥

दोहा ।

कहाँहिं सत्य तज पक्ष हम, लोक-विमोहन नारि । श्रुत या सों दुखद अपर, नहिं कछु लेहु बिचारि ॥५४॥

सार—स्त्रीसे बढ़कर सुखदायी और दुख- दायी और कोई नहीं ।

54. O men, I tell you the truth and without any partiality that, in this world, there is nothing so attractive to the mind as the women and again, nothing so painful also.

—*

तावेदेव ऋतिनामपि स्फुरत्येष निर्मलविवेकदीपकः १

तावेदेव न कुरंगचतुर्णां ताव्यते चपललोचनाञ्चलैः ॥५५॥

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