शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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है। वह अबला दीखने पर भी सबला और गौ होने पर भी बाध होती है। वह निरङ्कुश होकर पुरुषको नाना प्रकारसे नचाती और सेवककी तरह उससे काम कराती है। बुधा विलास-बिह् दिखाकर उससे पैर दबवाती और अपनी इच्छा होनेसे उसका रक्त-मांस चूसती है। जरासी फरमायश पूरी न होनेसे और घरकी एक चीज़ भी समय पर न आनेसे उसके प्राण ले लेती और उसके कलेजेको वाक्यवाणीसे विद्ध करके चलनी बना देती है। बहुत कहाँ तक कहें, नरकके दुःख कुलटाके दिये दुःखाँके सामने लजा जाते हैं।
सारांश यही है, कि अगर स्त्री नवयौवना, रूपवती और पतिव्रता हो, तो पुरुषको जो कष्ट उठाने पड़ते हैं, उनसे उसे उतना कष्ट या मनोवेदना नहीं होती। वह स्वयं बाहरके कष्टों को हर लेती है। पर पतिव्रताके होने पर भी, पुरुष कष्ट और अपमानसे बच नहीं सकता। इसलिये, इसमें शक नहीं कि, स्त्री सुख और दुःख दोनों ही की हेतु है, यानी स्त्रीसे सुख भी है और दुःख भी है। सुख थोड़ा और नाम मात्रको है और वह भी अज्ञानीके लिये। ज्ञानी और विरागीकी नज़रमें तो दुःख-ही-दुःख है; इसलिये जिन्हें कष्ट और भंभटोंसे बचना हो, जिन्हें आत्माका कल्याण करना हो, वे इस मनोहर विष-बेलसे बचें। फोन्टेनेली महोदय कहते हैं :—“A beautiful woman is the “hell” of the soul, the “purgatory” of the purse and the “paradise” of the eyes.” सुन्दरी कामिनी