भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 230

( १६३ )

किं तु त्रवीणि बलिनां पुरतः प्रसह्य

कन्दर्पदर्पदलने विरला मनुष्याः ॥५८॥

इस पृथ्वी पर, मतवाले हाथीका मस्तक विदारनेवाले शूर अनेक हैं, प्रचण्ड मृगराज—सिंहके मारनेवाले भी कितने ही मिल सकते हैं ; परन्तु बलवानोंके सामने हम हठ करके कहते हैं, कि कामदेवके मदको मर्दन करनेवाले पुरुष कोई बिरले ही होंगे ॥५८॥

खुलासा—हाथियों और सिंहोंको पराजित करनेवाले शूर-वीर इस पृथ्वीपर अनेक मिल सकते हैं ; पर कामदेवको वशमें करनेवाला अथवा कामिनीके कटाक्ष-वाणोंसे पराजित न होने वाला, कोई एक भी कठिनसे मिलता है । बड़े-बड़े युद्धक्षेत्रोंमें विजयी होनेवाले शूरवीरोंकी भी शूरवीरता इन कामिनियोंके आगे न जाने कहाँ चली जाती है ? बड़े-बड़े बहादुरोंकी ज़बानसे यही निकलता है—

मर गये हम इक इशारेमें निगाहे नाज़ुके ।

पर वक़ौल स्वामि शंकराचार्यजीके सच्चा शूरवीर वही है, जो मनोज—कामदेवके वाणोंसे व्यथित न हो अर्थात् कामिनीके दाममें न फँसे । कहा है—

यूरान्महाशुरतमोऽस्ति को वा ? ।

मनोजवाणैर्व्यथितो न यस्तु ॥

१३