भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १६२ )

लुक् मे तुभसे क्या कहूँ जाहिर । हाय ! कम्बल तूने पीही नहीं ॥

हे भक्त ! मैं तुम्हें शराबका मज़ा कैसे बताऊँ ? कम्बल तूने उसे पिया ही नहीं । जो मदिरा पीता है और नाज़नियोंको भोगता है, वही जानता है कि, उनमें क्या मज़ा है । उस मज़ेका हाल ज़बानसे बताना कठिन ही नहीं, असम्भव है । सच मानिये, पृथ्वी पर अगर स्वर्ग है, तो कमलनयनी उठती जवानीकी सुन्दरियाँमें ही हैं ।

दोहा ।

नारिनी निन्दा करत, ते पण्डित मतहीन । स्वर्ग गये तिनको सुनै, सदा अस्सरा लीन ॥४७॥

सार—स्त्रियोंको निन्दा करनेवाला पाखण्डी है । आप उन्हें भोगना चाहता है, पर दूसरों को रोकता है ।

57. Those scholars who speak ill of women are liars in as much as they deceive others and also themselves ; for the result of austerity is heaven and the result of attaining heaven is the enjoy- ment of nymphs.

—*—

मतेभकुम्भदलने भुवि सन्ति शूराः केचित्यचण्डमृगराजवधेऽपि दृत्वा ॥