शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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ही है । लाल रत्न-जटित करधनीवाली कमलनयनी त्रिगोत्री मनोहर जंवाब्रोंको कौन त्याग सकता है ? ॥५६॥
खुलासा—पाण्डित्यका ढकोसला दिखाने वाले पण्डित वास्तवमें स्त्री-त्यागका उपदेश नहीं देते ; खाली अपना पाण्डित्य दिखानेके लिये ज्ञवानसे बकते हैं । वे गोस्वामी तुलसी दासकी इस कहावतके अनुसार “परोपदेश कुशल बहुतेरे, आप चलहिं ऐसे नर न घनेर” लोगोंको उपदेश भर ही देते हैं, आप खुद अमल नहीं कर सकते । वे किसी ललित ललनाके कटाक्षवर्णोंसे विद्व नहीं हुए हैं, इसीसे बातें बनाते हैं ; जब स्वयं उन पर पड़ेगी, तब सब शास्त्रोंको भूल जायँगे । महाकवि दागने ऐसो ही के लिए कहा है :—
दिललगी दिललगी नहीं नासह ! तेरे दिलको यभी लगी ही नहीं ॥
उपदेशकजी ! दिललगी दिललगी नहीं है, उसी समय तक आप इसे दिललगी समझते हैं, जब तक कि आपके दिलको लगी नहीं है । अगर किसीसे दिल लगा, तो आपका सारा पाण्डित्य हवा हो जायगा ।
सौन्दर्य्य मामूली चीज़ नहीं ; ऐसा कौन है, जिसे सौन्दर्य्य अपनी ओर न खींच सके ? मिश्रर कलेण्डन कहते हैं—“A beautiful object doth attract the sight of all men, that it is no man's power not to be pleased with