भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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ऐ ज्ञौक ! उसकी मदनमत्त मनोहर आँखके सामने आज हमारी योग्यता और बुद्धिमत्ताका अन्त हो गया ।

सब है, जब तक चञ्चल नेत्रोंवाली कामिनीकी नज़रसे नज़र नहीं मिलती, तभी तक विवेक, बुद्धि और विचारोंका अस्तित्व समझिये । उसकी नज़रसे नज़र मिलते ही इनका क्षातमा हो जाता है ।

दोहा ।

दीपक जरत विवेकको, तों लों या चित माहिं ।

जों लों नारि-कटाक्ष-पट, पवनसु परसत नाहिं ॥५५॥

साँर—मृगनयनी नवयुवतीसे चार नज़र होते ही विवेक और बुद्धि सब हवा हो जाते हैं ।

55. The light of reasoning flickers in the heart of a wise man only so long as it is not put out by the moving eyes of a lotus-eyed woman as if by a scarf.

—*

वचसि भवति संगत्यागमुद्दिश्य वातां

श्रुतिमुखरसुखानां केवलं पण्डितानाम् ॥

जघनमरुणरन्ध्रिकाञ्चीकलापं

कुवलयनयनानांको विहातुं समर्थः ॥५६॥

शास्त्रवक्ता पण्डितोका व्री-त्यागका उपदेश केवल कथनमात्र

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