भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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और पुण्यात्मा है। उसे इसी पृथ्वी पर ही स्वर्ग है। लेकिन जिसकी स्त्री फूहर और कर्कशा है, घरको मैला रखती है, बच्चों को सूरगले रखती है, खाना बनाना भी नहीं जानती, मनमें आवे जैसी कच्ची-पक्की जली-अधजली रोटियाँ खिलाती है, हर घड़ी मुँह कुलाये रहती है, घरमें देवासुर-संग्रामका तमाशा दिखाया करती है, उस पुरुषके लिए यहीं नरक है। किसी कविने खूब कहा है :—

भातको मांड करै नहिँ रौँड, औं सौगुनो साँभर सागमें डारे। भूल के खाँड ले डारत दालमें, हींग कुलायके खीर बवारै। चाकते रोटी हु मोटी करै, औं काचीही रखेकि जारही डारे। भूतसी भौनमें ठाडी रहै, परमेश्वर ऐसी सों पालो न पारे॥

अर्थात् जो स्त्री भातका माँड़ नहीं पसाती, सागमें सौगुना नमक डालती है, भूलकर दालमें चीनी मिला देती है, खीरमें हींगका छोंक देती है, कुम्हारके चाक-जैसी मोटी रोटियाँ करती है, उन्हें कच्ची रखती या जला डालती है, और भूतनीसी घरमें खड़ी रहती है, परमेश्वर ऐसी खीसे पाला न पड़े। जिनपर