शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 198, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( १६३ )
लोग, दिन निकल आने पर भी, घरसे बाहर नहीं जाते—अपने पलंगों पर ही पड़े रहते हैं। उनकी भुगनयनी खियाँ, जाड़ेके मारे काँपती हुई, उन्हें अपनी छातियोंसे ढगा लेती हैं और मेह की फुहारोंसे मिली हुई शीतल हवा उनकी मैथुनकी थकानको मिटा देती है। जिन्होंने पूर्वजन्ममें पुण्य किया है, उनको वर्षाके बुरे दिन भी इस तरह सुखदाई हो जाते हैं। पुण्यवानों को दुःखमें सुख और जड़लमें मझूल होता है।
क्षप्य ।
प्राविट् वर्षत मेह, चट्पौ दिन शीत अधिकतर । बाहर नहि कठि सकत, नेह सौं परा कोउ नर ॥ क्रम्य होत जब गात, तबहि प्यारी संग सेवत । उठत अंग-तरंग, अंगमें अंग समोवत ॥ रत-वेद-स्वेद छेदन करत, जालरन्ध्रे श्वात पवन । इहि विधि दुर्दिक्स हू मोदप्रद, होवहि तिय-संग बसि भवन ॥
सार—पुण्यवानोंको वर्षाके दुर्दिन भी, अपनी प्राणप्यारियों की सुहृत्तमे, सुदिन हो जाते हैं।
46. On a rainy day, the lover cannot come out of his house and the long eyed lady shivering with cold embraces fast her husband ; the cold wind blows carrying with it small particles of water that takes away the fatigue arising from copulation. Surely, even