भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 199

( १६४ )

the evil days of a fortunate man become good in the company of beloved wife,

—**—

शरद-महिमा ।

अर्द्धं नीत्वा निशायः सरभसुरतावासखिन्नश्लथंगः मोदभूतासद्यतृष्णो मधुमदनिरतो हर्म्यगृहे विविकं ॥ संभोगकान्तकान्ताशियिलधुजलतातर्जितं कर्करीतो ज्योत्स्नाभिन्नाच्छवारंपिवतितनसलिलंशारदंमन्दभाग्यः ॥४७॥

आधी रात बीतने पर, जल्दी-जल्दी मैथुन करके थक जाने पर और उसीकी वजहसे असह्य प्यास लगने पर, मदिरेके नशे की हालतमें, महलकी स्वच्छ छत पर बैठा हुआ पुरुष, यदि मैथुनके कारण थकी हुई भुजाओंवाली प्यारीके हाथोंसे लाई हुई भारीका निर्मल जल, शरदकी चाँदनीमें नहीं पीता, तो वह निश्चय ही अभागा है ॥४७॥

व्यप्य ।

व्यके मदनकी व्याक, सुदित मदिरेके व्याके । करत सुरत रण रंग, जंग कर कहु-इक थाके ॥