भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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स्तनों को रोमाञ्चित करता है ; शिशिर-वायु भी वही करता है । पुरुष स्त्रीकी जाँघों से कपड़ा हटाता है, शिशिर-वायु भी जाँघों से वस्त्र हटाता है । बहुत क्या—शिशिरका वायु हर तरह स्त्रियोंके साथ पतियोंका सा आचरण करता है—पराई स्त्रियोंको दिन-दहाड़े बेखटके भोगता है ।

व्यप्यय ।

तुम्बन करत कपोल, मुखहि सीत्कार करावत । हृदय मैंहि घसि जात, कुचन पर रोम बरावत ॥ जंघनको थहरात, वसन हू दूर करत झुक । लग्यो रहत संग मैंहि, द्वारको रोक रखौं डुक ॥ यह शिशिर पवन विटरूप धर, गलिन-गलिन भटकत भिरत । मिल रहे नारि नर घरनमें, चाकी भटमेर न भिरत ॥४९॥

सार—शिशिर ऋतुका वायु, पराई स्त्रियों के साथ, जारोंका सा काम करता है ।

49. The wind in the winter season blows behaving itself like a lustful man at the time of copulation, it causes the hair of the breast which is without any jacket to stand on end, it kisses the face with flowing hairs and with shivering sounds in the mouth just as one hears at the time of copulation, shaking the thighs and making the clothes of hips and loins to fly about.

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