भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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केशानाकलयन्द्शो मुकुलयन्वासो बलादाक्षिप-

त्रातन्वनुलकोद्गर्भं प्रकट्यन्नालिंग्य कम्पञ्छनैः ।

वारम्बारमुदारसीत्कृतकृतोदन्तच्छदानृपीडय-

नृपायःशैशिर एष संपति भरुत्कांतासु कांतायते ॥५०॥

वालोंको वखेरता, आँखोंको कुछ-कुछ मूँदता, साड़ीको जोरसे उड़ाता, देहको रोमाञ्चित करता, शरीरमें सनसनी पैदा करता, काँपते हुए शरीरको आलिंगन करता, बारम्बार सी-सी कराकर होठों को चूमता हुआ, शिशिरका वायु पतियोंका सा आचरण करता है ॥५०॥

खुलासा—शिशिर-वायु स्त्रियोंके साथ बेहया, मस्त अथवा शहवतपरस्त पतियोंका सा काम करता है ।

व्यप्य ।

विलुलित करत सुकेश, नयन हूँ छिन-छिन मूँदत ।

वसनन ऐसे लेत, देह रोमाञ्चन रूँदत ॥

करत हृदयको कम्प, कहत मुखहूँ सों तीसी ।

पीड़ा करतहि होठ, वयारहुँ बार सिरिसी ।

यह शीतकालमें जानिये, अद्भुत गति धारन पवन ।

पनिशि-चौस दुरे दुबके रहो, निज नारी संग निज भवन ॥५०॥

50 The air in the winter season acts like a husband in the case of women by scattering their hairs, shutting their eyes, forcibly