शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 202, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिशिर-महिमा ।
जुवनतो गंडभितीरलकवति मुखे सीत्कृतान्यादधाना वक्षःस्तर्कजुकेषु स्तनभरणुलकोद्भेदमापादयन्तः ॥ उरुनाकंपयंतः प्रयुजयनतटातुलंसयंतौशुकानि व्यक्तं कांताजनानां विट्चरितकृतः शैशिरा वांति वाताः ॥४६॥
स्त्रियोंके केशयुक्त गालोंको चूमता हुआ, जोरके जाड़ेके मारे उनके मुँह से “सी-सी” कराता हुआ, ब्रँगी-रहित खुले हुए स्तनोंको रेमाण्डित करता हुआ, पेड़ोंको कँपाता हुआ और पुष्ट जोंबोसे कपड़ा हटाता हुआ, शिशिरका वायु जर पृथ्वीका सा आचरण करता हुआ वह रहा है ॥४६॥
खुलासा—पति स्त्रीके साथ जो-जो काम करता है, शिशिर का वायु भी वही सब काम करता है। पति गालोंको चूमता है, शिशिरका वायु भी बालोंको इधर-उधर करता हुआ गालोंको चूमता है। पति मैथुनके आनन्दमें मग्न करके स्त्रीके मुँहसे “सी-सी” कराता है; उसी तरह शिशिरका वायु भी जाड़ेकी अधिकताके मारे उनके मुखोंसे “सी-सी” कराता है। पुरुष