भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १६६ )

हेमन्त ऋतुमें जो दही, दूध और घी खाते हैं ; मँजीठके रंगमें रंगे हुए वस्त्र पहनते हैं ; शरीरमें केसर का गाढ़ा-गाढ़ा लेप करते हैं ; आसन-भेदसे अनेक प्रकार मैथुन करके सुखी होते हैं ; पृष्ठ जाँचों और सघन कठोर कुचोंवाली स्त्रियोंका गाढ़ आलिङ्गन करते हैं और मसालेदार पानका बीड़ा चबाते हुए मकानके भीतरी कमरेमें सुखसे सोते हैं, वे निश्चय ही भाग्यवान् हैं ॥४८॥

महाकवि कालिदास-रचित भी एक श्लोक पढ़िये :—

पुष्पासवामोदसुगन्धवक्त्रो, निःश्वासवतीः सुरभीकृतांगः ।

परस्परगव्यतिषंगशायी, शेतै जनः कामशरानुविद्धः ॥

हे प्यारी ! इस हेमन्त ऋतुमें, कामार्त्ता स्त्री-पुरुष फूलोंकी शराबकी गन्धसे मुँहको और अपने श्वासवायुसे अङ्गोंको सुगन्धित किये, परस्पर लिपटे हुए सोते रहते हैं ।

सोराडा ।

दही दूध घृत पान, वसन मजीठहि रंगके ।

आलिगन रति दान, केसर चर्चि हिमन्तमें ॥४९॥

48. Blessed is the man who, in the winter, eats the food rich with milk, curd and ghee, wears clothes coloured in scarlet-red Manjistha, besmears his body thickly with paste of saffron and musk, is embraced by a woman with swollen breasts after being exhausted by various kinds of sexual intercourse and with his mouth full of betels, sleeps happily in his house.

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