शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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वरोनी रूपी पंख धारण किये, धीरजको बुझानेवाले नयन-रूपी वाण हृदयमें नहीं लगते ॥५६॥
खुलासा—पुरुष उसी समय तक सन्मार्गी, इन्द्रियविजयी, लज्जाशील और विनीत रहता है, जब तक वह कामिनीके कटाक्ष से घायल नहीं होता अथवा उसकी किसी नाज़नीसे आँखें नहीं लड़ती। आँख लड़ते ही, वह उसकी एक-एक अद्दा पर पागल हो जाता है और वक्रौल महाकवि ग़ालिब यही कहता है—
बलाये जाँ है ग़ालिब ! उसकी हर बात । इबारत क्या, इबारत क्या, अद्दा क्या ॥
उसका देखना-भालना, लिखना-बोलना सभी ग़ज़ब दाहने वाले हैं।
बहुत लिखना व्यर्थ है, चंचल-नयनी कामिनीसे चार नज़र होते ही मनुष्यके शान्ति, सन्तोष, लज्जा और शर्म सब हवा हो जाते हैं। उस्ताद ज़ौन्नै ठीक ही कहा है :—
छोड़ा न दिलमें, सब आराम न शिकेव । तेरी निगाहने साफ़ किया, घरके घर पै हाथ ॥
तेरी दृष्टिने सब-सन्तोष, शान्ति और सुख सबका पटड़ा कर दिया—(इतना ही नहीं) सारे घर पर ही हाथ साफ़ कर दिया।