भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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कामिनीके कटाक्षका मारा पुरुष कामानुर हो जाता है ; उस समय उसमें भय, लज्जा और धीरज नहीं रहता । वह डर-भय और लाज-शर्मको ताक पर रखकर, अधीर हुआ, उसके देखने, मिलने और आलिकून करनेके लिये छटपटाता है । उसको एक प्रकारका नशा सा हो जाता है ; इसलिये वह सारे काम मत-वालोंकेसे किया करता है । लोगोंके समझाने-बुझानेका कुछ फल नहीं होता । वेदान्तियोंकी वेदान्त-विद्या, भागवतियोंकी भागवत और गीतावालोंका गीता, इस मौकै पर कुछ भी काम नहीं करते ; सभी निष्फल हो जाते हैं ।

क्षेमेन्द्र महाशयने ठीक ही कहा है—

न श्रूतेन न वितेन न वृत्तेन न कर्मणा ।

प्रवृत्तं शक्यते रोदुं मनोभवपथेमनः ॥

कामदेवकी राह पर आया हुआ मन किसी भी उपायसे उस राहसे हटाया नहीं जा सकता ।

बकुल महाकवि दाग, नाइनियोंके निगाहे तीरके घायलोंकी अपनी कही सुनिये :—

नाम निकला तो कभी दिलसे कभी आहोफुगों ।

पर तरे वस्त्रका अरमान निकला ही नहीं ॥

मेरे दिलसे कभी आह निकलती है, तो कभी दीर्घ निःश्वास ; पर तेरे मिलनेकी चिरपालित अभिलाष कभी नहीं निकलती ।