भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १६६ )

है तेरी राहे सुहृत्त्वमें हज़ारों फ़ितने ।

देख, सुभक्तो वजुज इस राहके चलता ही नहीं ॥

तेरे प्रेमकी राहमें हज़ारों विघ्न-बाधयें हैं ; किन्तु मुझे देख, कि उस राह पर चले बिना मेरा मनही नहीं मानता ; यानी मैं और राहका पथिक बनना नहीं चाहता ।

दोहा ।

इन्द्दी-दम लज्जा विनय, तौं लों सब शुभ कर्म ।

जौं लों नारी-नयन-शर, छेदत नाही मर्म ॥५६॥

सार—स्त्रियोंके नयन-वाण लगते ही पुरुष के लज्जा और नेत्रता प्रभृति गुण हवा हो जाते हैं ।

59. A man is in right path, has his passions under his control and has modesty and humility in him only so long as the eyes of women with beautiful eye-lids in the form of arrows with wings, stealing the patience, thrown from brows in the form of bows that are strung up to the ears, do not pierce the heart.

—*

उन्मत्तप्रेमसंस्मादारभन्ते यदंगनाः ।

तत्र प्रत्युहमाधातुं ब्रह्मपि खलु कातरः ॥१०॥