भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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अतिशय प्रेमकी उर्मगसे उन्मत्त होकर खिंचाँ। जिस कामको आरम्भ कर देती हैं, उस काममें विन्म-बाधा उपस्थित करते ब्रह्मा भी डरता है ॥६०॥

खुलासा—इश्वरके जोश और जल्दीमें स्त्री जो काम कर बैठती है, उससे उसे मनुष्य तो कौन चीज़ है, स्वयं ब्रह्मा भी नहीं रोक सकता। स्त्री अत्यन्त काम-पीड़ित होने पर जो छल-बल और साहसके काम करती है, उनको देखकर उसके बनाने वाला ब्रह्मा भी दाँतों तले अँगुली देने लगता है। सास-ससुर, पति-पुत्र कोई भी उसे कुकर्मोंसे विरत कर नहीं सकते।

कामवती स्त्री अत्यन्त कुटिल, क्रूर आचरण वाली और लज्जाहीना हो जाती है। उस समय वह अपने पति, पिता, माता, पुत्र, वन्धु और कुटुम्बी तकसे द्रोह करने और उनका नाश करनेमें भी नहीं हिचकती। धमासान युद्धक्षेत्रमें भी वह बन्दूककी गोलियों और तोपोंके गोलोंकी परवा न करके, यदि उसे जाना हो, तो पहुँचती है। जिस श्मशान पर अकेला-डुकेला मर्द भी न जा सकता हो, उस पर वह घोर अँवारी रातमें बादलोंके गरजने, विजलीके कड़कने और ऐसी ही अनेक आप-दाओंके होने पर भी—बेघड़क पहुँचती है। स्त्रीके साहस की बात न पूछिये। ऐसा कौनसा काम है, जिसे वह, इच्छा करने पर, नहीं कर सकती ? किसी पाश्चात्य विद्वान्ने भी कहा है :— “A woman when she either loves or hates, will dare anything.” स्त्री जब प्रेम या घृणा किसी एक पर