भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २०१ )

तुल जाती है, तब सब कुछ करनेका साहस कर सकती है। किसी कविने कहा है :—

कहा न श्रवल्ला कर सके* ? कहा न सिन्धु समाय ? कहा न पावकमें जरे ? काहि काल नहि खाय ?

“रसिक” कविने भी कहा है—

दोहा ।

कहा त्रिया नहि कर सके, कामवती जब होय ? “रसिक” सास पति पुल सब, कर न सके कछुकोय ॥३०॥

दोहा ।

महामत् या प्रेमको, जब तिय करत उदोत । तब वाके छलवल निरखि, विधिहू कायर होत ॥

सा२—कामोन्मत्त स्त्री जो चाहे सो कर सकती है ।

60. Even Brahma ( the creator ) has not the power to obstruct the work which a woman undertakes being impassioned with the excitements of love.

ॐ एक पुत्र छोड़ कर स्त्री सब कुछ कर सकती है । केवल यहीं उसकी नहीं पसंदी ।

—*—