भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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तावन्महत्त्वं पाण्डित्यं कुलीनत्वं विवेकिता ।

यावद्ग्वलति नांगेषु हन्त पञ्चधुपावकः ॥६१॥

बड़ाई, पण्डिताई, कुलीनता और विवेक,—मनुष्यके हृदय में तभीतक रह सकते हैं, जबतक शरीरमें कामाग्नि प्रज्वलित नहीं होती ॥६१॥

खुलासा—इश्वरमें जात-पांति और नीच-ऊँचका विचार नहीं है। कामी पुरुषोंके विवेक या सत् असत् की विचारशक्ति को तो स्त्रियाँ अपनी एक नज़रमें ही हर लेती हैं। जब भले और बुरेको विचारनेकी शक्ति नहीं रहती, तब मनुष्यमें कुलीनता प्रभृति गुण कैसे रह सकते हैं? अनेक पुरुष मुसलमानियोंके प्रेम में फँसकर मुसलमान हो गये हैं। कितने ही मेमोंके मोहजाल में फँसकर अपने हिन्दुत्व और ब्राह्मणत्वको तिलाञ्जलि देकर काले साहब बन गये हैं। यह तो कुछ नहीं, हमने कितने ही उच्च कुलके हिन्दू मेहतरानियोंके इश्वरमें गिरफ्तार होकर मेहतर होते देखे हैं। इसमें ज़रा भी शक नहीं कि, कामाग्निके प्रज्वलित होते ही, बड़प्पन और कुलीनता प्रभृति हवा हो जाते हैं।

जबसे अंगरेज़ी राज इस देशमें हुआ है, अनेकों अमीरोंके लड़के, भारतमें बी० ए०, एम० ए० पास करके, वैरिष्ट्री या सिविल सर्विसकी परीक्षा पास करने इंग्लैण्ड जाते हैं। ये विद्वान् नवयुवक वहाँकी मिसोंकी लूनाई, सुखड़ाई और रूप-माधुरी देखकर पागल हो जाते हैं। कितने ही उनको व्याह लाते हैं और इस तरह