भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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अपने दीनो ईमान या धर्मको खोकर जातिच्युत होते हैं। यहाँके लोग उनकी हँसी उड़ाते और घोर-घोर निन्दा करते हैं। पर इससे होता क्या है ? उनके वशकी बात नहीं। नवयौवना मिसोंसे चार नज़र होते ही, वे अपनी विद्या-बुद्धिको भूलकर उन पर पागल हो जाते हैं। महाकवि अकबरने ऐसे ही एक लन्दन-प्रवासीका, जो एक मिसके केश-पाशमें फँस गया था, अच्छा चित्र खींचा है :—

रात उस मिससे कलीसोंमें हुआ मैं दोचार । हाय वह हुस्न वो शोखी वो नज़ाकत वो उभार ॥ जुल्फ-पेचाँमें वो सजधज कि बलायँ भी सुरीद । कड़े-राना मैं वो चमखम कि कयामत भी शहीद ॥ दिलकशी चालमें ऐसी कि सितारे रुक जायँ । सरकशी नाजमें ऐसी कि गवर्नर भुक जायँ ॥ आतिशे हुस्न से तक्वा को जलाने वाली । विजलिथँ लुल्फे-तवस्सुम से गिराने वाली ॥ पिस गया लोट गया दिलमें सकत ही न रही । सुर थे तमकीनके जिस गतमें वो गत ही न रही ॥ अर्जकी मैंने कि ऐ गुलशने-फ़ितरतकी बहार ! दौलतों इज्जतों ईमाँ तेरे कदमें प निसार ॥ तू अगर अहदे वफा बाँधके मेरी हो जाय । सारी दुनियासे मेरे क़ल्बको सेरी हो जाय ॥