भारतकोश
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शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( २०२ )

तावन्महत्त्वं पाण्डित्यं कुलीनत्वं विवेकिता ।

यावद्ग्वलति नांगेषु हन्त पञ्चधुपावकः ॥६१॥

बड़ाई, पण्डिताई, कुलीनता और विवेक,—मनुष्यके हृदय में तभीतक रह सकते हैं, जबतक शरीरमें कामाग्नि प्रज्वलित नहीं होती ॥६१॥

खुलासा—इश्वरमें जात-पांति और नीच-ऊँचका विचार नहीं है। कामी पुरुषोंके विवेक या सत् असत् की विचारशक्ति को तो स्त्रियाँ अपनी एक नज़रमें ही हर लेती हैं। जब भले और बुरेको विचारनेकी शक्ति नहीं रहती, तब मनुष्यमें कुलीनता प्रभृति गुण कैसे रह सकते हैं? अनेक पुरुष मुसलमानियोंके प्रेम में फँसकर मुसलमान हो गये हैं। कितने ही मेमोंके मोहजाल में फँसकर अपने हिन्दुत्व और ब्राह्मणत्वको तिलाञ्जलि देकर काले साहब बन गये हैं। यह तो कुछ नहीं, हमने कितने ही उच्च कुलके हिन्दू मेहतरानियोंके इश्वरमें गिरफ्तार होकर मेहतर होते देखे हैं। इसमें ज़रा भी शक नहीं कि, कामाग्निके प्रज्वलित होते ही, बड़प्पन और कुलीनता प्रभृति हवा हो जाते हैं।

जबसे अंगरेज़ी राज इस देशमें हुआ है, अनेकों अमीरोंके लड़के, भारतमें बी० ए०, एम० ए० पास करके, वैरिष्ट्री या सिविल सर्विसकी परीक्षा पास करने इंग्लैण्ड जाते हैं। ये विद्वान् नवयुवक वहाँकी मिसोंकी लूनाई, सुखड़ाई और रूप-माधुरी देखकर पागल हो जाते हैं। कितने ही उनको व्याह लाते हैं और इस तरह

( २०३ )

अपने दीनो ईमान या धर्मको खोकर जातिच्युत होते हैं। यहाँके लोग उनकी हँसी उड़ाते और घोर-घोर निन्दा करते हैं। पर इससे होता क्या है ? उनके वशकी बात नहीं। नवयौवना मिसोंसे चार नज़र होते ही, वे अपनी विद्या-बुद्धिको भूलकर उन पर पागल हो जाते हैं। महाकवि अकबरने ऐसे ही एक लन्दन-प्रवासीका, जो एक मिसके केश-पाशमें फँस गया था, अच्छा चित्र खींचा है :—

रात उस मिससे कलीसोंमें हुआ मैं दोचार । हाय वह हुस्न वो शोखी वो नज़ाकत वो उभार ॥ जुल्फ-पेचाँमें वो सजधज कि बलायँ भी सुरीद । कड़े-राना मैं वो चमखम कि कयामत भी शहीद ॥ दिलकशी चालमें ऐसी कि सितारे रुक जायँ । सरकशी नाजमें ऐसी कि गवर्नर भुक जायँ ॥ आतिशे हुस्न से तक्वा को जलाने वाली । विजलिथँ लुल्फे-तवस्सुम से गिराने वाली ॥ पिस गया लोट गया दिलमें सकत ही न रही । सुर थे तमकीनके जिस गतमें वो गत ही न रही ॥ अर्जकी मैंने कि ऐ गुलशने-फ़ितरतकी बहार ! दौलतों इज्जतों ईमाँ तेरे कदमें प निसार ॥ तू अगर अहदे वफा बाँधके मेरी हो जाय । सारी दुनियासे मेरे क़ल्बको सेरी हो जाय ॥

( २०४ )

रातके समय उस मिससे गिरजेमें मेरी मुठभेड़ हो गई। हाय ! उसके रूप-लावण्य, उसकी चञ्चलता, उसकी जवानीके उभारका बयान कैसे करूँ ? उसकी पेचदार लट्ठोंमें वह बलाकी सजधज थी कि, जिसको देखकर बलायें स्वयं उसका लोहा मान लें। उसके नाजूक शरीरमें वह चमक-दमक कि, जिसको देखकर प्रलय भी उस पर मरने लगे। उसकी चालमें ऐसी कशिश कि, जिसको देखकर सितारोंकी चाल भी मन्दी पड़ जाय। उसके हाव-भावोंमें ऐसी ऐंट कि, जिसको देखकर गवर्नर लोग भी उसके सामने सिर झुका दें। उसकी खूबसूरतीमें ऐसी लपट कि, जिससे सदाचारके भाव भस्म हो जायँ। उसकी मन्द-मुसक्यानमें ऐसी चकाचौंध कि, जिससे प्रेमीके दिलपर बिजली गिर पड़े। उसके देखते ही मेरा दिल पिस गया और मेरे शरीरकी सारी ताकत निकल गई। मैं ज़मीनपर बेहोश होकर लोटने लगा। धीरजके स्वर जिस गतमें बज रहे थे, वह गत ही हृदयमें न रही। मैंने कहा—“ऐ प्रकृतिकी कुलवाड़ीकी बहार ! मेरा धन-धर्म और मान-मर्यादा सब तेरे चरणोंमें अर्पण हैं। यदि सच्ची मुहब्बतकी प्रतिज्ञा करके, तू मेरी हो जाय, तो मेरा जी सारे संसारसे भर जाय।

दोहा ।

बुद्धि विवेक कुलीनता, तौं लों ही मन माहिं । कामवाण की अग्नि तन, जौं लों धधकत नाहिं ॥६१॥

( २०५ )

सार—प्रेम—कुलीनता, विवेक और पाण्डित्य प्रभृति सद्गुणोंका शत्रु है ।

61. Respectibility, wisdom, good sense and family distinction find place in a man only so long as the fire of passion has not begun to burn in him.

—*

शास्त्रज्ञोऽपि प्रथितविनयोऽप्यात्मबोधोऽपि बाधं

संसारेऽस्मिन् भवति विरलो भाननं सद्दीनाम् ॥

येनेतस्मिन्नेत्यनगरद्वारमुद्घाटयन्ती

वामाचीणां भवति कुटिलश्रूलता कुञ्चिकेव ॥६२॥

शास्त्रज्ञ, विनयी और आत्मज्ञानियोंमें कोई विरला ही ऐसा होगा, जो सद्गतिका पात्र हो ; क्योंकि यहाँ वामलोचना स्त्रियोंकी बाँकी श्रू-लता-रूपी कुञ्जी उनके लिए नरकद्वारका ताला खोले रहती है ॥६२॥

खुलासा—शास्त्रज्ञ और ब्रह्मज्ञानियोंकी सद्गति तो तभी हो सकती है, जब कि वे कामिनीकी बाँकी भाँहोंकी भूपटमें आनेसे बचें । उनकी कमानसी भाँहोंको देखकर बड़े-बड़े वेदान्तियोंकी अङ्क मारी जाती है । वह हज़ार गीता, भागवत और उपनिषदोंका पाठ करें, हज़ार योगवासिष्ठोंका परीक्षण करें ; पर उनके चित्त पर चढ़ी कामिनीका उत्तरण बहुत कठिन

( २०४ )

रातके समय उस मिससे गिरजेमें मेरी मुठभेड़ हो गई। हाय ! उसके रूप-लावण्य, उसकी चञ्चलता, उसकी जवानीके उभारका बयान कैसे करूँ ? उसकी पेशदार लट्ठोंमें वह बलाकी सजधज थी कि, जिसको देखकर बलायें स्वयं उसका लोहा मान लें। उसके नाजूक शरीरमें वह चमक-दमक कि, जिसको देखकर प्रलय भी उस पर मरने लगे। उसकी चालमें ऐसी कशिश कि, जिसको देखकर सितारोंकी चाल भी मन्दी पड़ जाय। उसके हाव-भावोंमें ऐसी ऐंठ कि, जिसको देखकर गवर्नर लोग भी उसके सामने सिर झुका दें। उसकी खूबसूरतीमें ऐसी लपट कि, जिससे सदाचारके भाव भस्म हो जायँ। उसकी मन्द-मुसक्यानमें ऐसी चकाचौंध कि, जिससे प्रेमीके दिलपर बिजली गिर पड़े। उसके देखते ही मेरा दिल पिस गया और मेरे शरीरकी सारी ताकत निकल गई। मैं ज़मीनपर बेहोश होकर लोटने लगा। धीरजके स्वर जिस गतमें बज रहे थे, वह गत ही हृदयमें न रही। मैंने कहा—“ये प्रकृतिकी फुलवाड़ीकी बहार ! मेरा धन-धर्म और मान-मर्यादा सब तेरे चरणोंमें अर्पण है। यदि सच्ची मुहब्बतकी प्रतिज्ञा करके, तू मेरी हो जाय, तो मेरा जी सारे संसारसे भर जाय।

दोहा ।

बुद्धि विवेक कुलीनता, तौं लौं ही मन माहिं । कामवाण की अग्नि तन, जौं लौं धधकत नाहिं ॥६१॥

( २०५ )

सार—प्रेम—कुलीनता, विवेक और पाण्डित्य प्रभृति सदगुणोंका शत्रु है ।

61. Respectibility, wisdom, good sense and family distinction find place in a man only so long as the fire of passion has not begun to burn in him.

—*

शास्त्रज्ञोऽपि पथितविनयोऽप्यात्मबोधोऽपि बाधं संसारैऽस्मिन् भवति विरलो भजनं सद्गीतानाम् ॥

येनेतस्मिन्नरयनगरद्वारमुद्घाटयन्ती

वामाक्षीणां भवति कुटिलश्रूलता कुञ्चिकेव ॥६२॥

शास्त्रज्ञ, विनयी और आत्मज्ञानियोंमें कोई विरला ही ऐसा होगा, जो सद्गतिका पात्र हो ; क्योंकि यहाँ वामलोचना स्त्रियोंकी बाँकी श्रू-लता-रूपी कुञ्जी उनके लिए नरकद्वारका ताला खोले रहती है ॥६२॥

खुलासा—शास्त्रज्ञ और ब्रह्मज्ञानियोंकी सद्गति तो तभी हो सकती है, जब कि वे कामिनीकी बाँकी भाँहोंकी भूपटमें आनेसे बचें । उनकी कमानस्त्री भाँहोंको देखकर बड़े-बड़े वेदगुप्तियोंकी अङ्क मारी जाती है । वह हजार गीता, भागवत और उपनिषदोंका पाठ करें, हजार योगवासिष्ठोंका परीक्षीलन करें ; पर उनके चित्त पर चढ़ी कामिनीका उत्तरना बहुत कठिन

( २०६ )

हैं। पण्डितेन्द्र जगन्नाथ अपने “भामिनी विलास” में लिखते हैं :—

उपनिषदः परिपीता गीतापि च हतं मतिपथं नीता ।

तदपि न हा विधुवदना मानससदनाद्वबहिर्थाति ॥

उपनिषदोंका पान किया और गीता भी भली भाँति पढ़ा-समझा और मनन किया ; परन्तु हाय ! इतना सब करने पर भी, वह चन्द्रवदनी कामिनी मेरे मनरूपी घरसे बाहर नहीं जाती।

ईश्वरकी राहमें कामिनी और काञ्चन दो घाटियाँ हैं।

अगर संसारमें कामिनी और काञ्चन न होते, तो इस संसारसागरसे तरना और मोक्षलाभ करना कठिन न होता। मोक्षकी राहमें कामिनी और काञ्चन दो घाटियाँ पड़ती हैं। इन घाटियोंको पार करना अति कठिन है। जो इन घाटियोंको लोंघनेमें समर्थ हो, वही सद्गति या मोक्षका अधिकारी हो सकता है। महात्मा कबीर कहते हैं :—

चलूँ चलूँ सब कोइ कहै, पहुँचे बिरला कोय।

एक कलक अरु कामिनी, दुलैभ घाटी दोय ॥१॥

एक कलक अरु कामिनी, ये लौंवी तरवारि ।

चाले ये हरि भजनको, बिच ही लीन्हा मारि ॥२॥

( २०७ )

नारि पराई आपनी, भुगतै नरकै जाय । आगि-आगि सब एकसी, देते हाथ जरि जाय ॥३॥ नारी तो हम भी करी, पाया नहीं विचार । जब जानी तब परिहरी, नारी बड़ा बिकार ॥४॥ नारि नसावे तीन सुख, जेहि नर पासे होय । भक्ति मुक्ति अरु ज्ञानमें, पैठि सके नहिं कोय ॥५॥ एक कनक अरु कामिनी, दोऊ आगिनी माल । देखे ही तैं पर जले, परसि करे पैमाल ॥६॥ जहाँ काम तहाँ राम नहिं, राम तहाँ नहिं काम । दोऊ कबहुँ ना रहैं, काम राम इक ठाम ॥

( १ )

चलूँ चलूँ सब कहते हैं, पर कोई विरला ही पहुँचता है, क्योंकि उस ( भगवान्की ) राह में कनक और कामिनी दो दुर्लब्ध घाटियाँ हैं ।

( २ )

कनक और कामिनी ये दो लम्बी तलवारें हैं । हरिभजनको चले थे, पर इन तलवारोंने बीच राहमें ही मार लिया ।

( ३ )

स्त्री अपनी हो चाहे पराई, भोगनेसे नरकमें जाना ही पड़ता है ; क्योंकि अपनी आग और पराई आग—दोनोंमें ही हाथ देने से हाथ जलता है ।

( २०८ )

( ४ )

जब हममें विवेक-विचार नहीं था, तब हमने भी स्त्री की थी ; लेकिन जब उसका असल तत्व जाना, तब उसे त्याग दी ; क्योंकि स्त्रो बड़ी यिकारवान् है ।

( ५ )

स्त्री तीन सुखोंको नष्ट कर देती है । जिसके स्त्रो होती है, उसे ज्ञान नहीं होता ; अतः ईश्वर की भक्तिमें भी मन नहीं लगता और भक्ति बिना मुक्ति नहीं मिलती ।

( ६ )

कनक और कामिनी दोनों आगकी लपट हैं । इनके देखनेसे ही पर जलते हैं और छूनेसे तो प्राणी नष्ट ही हो जाता है ।

( ७ )

जहाँ स्त्री है वहाँ राम नहीं और जहाँ राम है वहाँ स्त्री नहीं । भगवान्की भक्ति और स्त्रीकी प्रीति दोनों एक ही पुरुष नहीं कर सकता । जिस तरह दिन और रात एकत्र नहीं हो सकते ; उसी तरह राम और काम भी एकत्र नहीं रह सकते ।

सारांश यह, मोक्ष लाभ करने या जन्म-मरणसे बचकर परमपद पानेमें ये स्त्रियाँ ही बाधक हैं । लोग इनके जालमें फँस जाते हैं, अतः जन्म-जन्मान्तर तक नरक भोगते हैं । उनको सद्गति मिलना कठिन हो जाता है । बकुल महाकवि ज्ञौक, कोई समझदार, जहाँदीदा पुरुष हो इस स्त्री-जालमें फसने से बचता है । कहा है :—

( २०६ )

दुनिया है वह सैयाद, कि सब दाममें इसके ।

आजाते हैं, लेकिन कोई दाना नहीं आता ॥

दुनिया वह जाल है कि, इसमें सभी फँस जाते हैं ; कोई बिचारशील हो इसमें फँसनेसे बचता है । जो इस जालमें नहीं फँसता, वही नरकोसे बचता और मुक्ति लाभ करता है ।

छप्यय ।

सब ग्रन्थनके ज्ञानवान अरु नीरिवान नर ।

तिनमें कोउ होत मुक्त-मारगमें तत्पर ॥

सबको देत बहाय, बंक-नयनी यह नारी ।

जाकी बाँकी मौह, नचत अतिही अनियारी ॥

यह कूँची करम कपाटकी, खेलनको जकृत फिरत ।

जिनके न लगत मन हगनमें, ते भवसागरको तरत ॥ ३ ॥

सार—सुन्दरी स्त्रियाँ पुरुषोंकी सद्गतिमें

बाधक हैं ।

62. One may be versed in the Shastras, reputedly wise and humble, but there are few who can claim the higher and better life —after death for, there is the oblique brow of women having beautiful eyes, moving in it which like a key opens the lock of the gate of hell,

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१४

( २१० )

कथः काणः खंजः श्रवणरहितः युच्छविकलो

त्रणी पूयक्लिन्नः कृमिकुलशतैराद्यततः ॥

जुवाचामो जीर्णः पिठरककपालपित्तगलः

शुनीमन्वेति स्वा हतमपि निहन्त्येव मदनः ॥६३॥

काना, लँगड़ा, कनकटा और दुमकटा कुत्ता, जिसके शरीरमें अनेक वाव हो रहे हैं, उनसे पीब और राध करते हैं, दुर्गन्धका ठिकाना नहीं है, वावोंमें हजारोंमें कीड़े पड़े हैं, जो भूखसे व्याकुल हो रहा है और जिसके गलेमें हाँड़ीका घेरा पड़ा हुआ है, कामान्ध होकर कुतियाके पीछे-पीछे दौड़ता है। हाय ! कामदेव बड़ा ही निर्दयी है, जो मेरेको भो मारता है ॥६३॥

खुलासा-कुत्ता इतने क्रूराँसे व्याप्त होने पर भी, शरीर में दम न होने पर भी और क्षुधासे व्याकुल होने पर भी, कामान्ध होकर, कुतिया के पीछे दौड़ता है। इससे स्पष्ट मालूम होता है कि, कामदेव बड़ा ही नीच और निर्दयी है ; क्योंकि वह मुसीबत से भरते हुएों पर भी, अपने सत्यानाशी वाण छोड़ने में आगा-पीछा नहीं करता। जो कामदेव ऐसे दुर्बलों का यह हाल करता है, वह मावा-मलाई घी-दूध और रबड़ी-पेढ़े खाने वाले सण्ड-मुसण्डोंका तो और भी बुरा हाल करता होगा। धूर्त साधू-सन्त और पण्डे-महन्त जो नित्य माल पर माल उड़ाते हैं, क्या काम-वाणोंसे रक्षित रहनेमें समर्थ हो सकते होंगे ? कदापि नहीं।

( २११ )

जो ऐसा कहते हैं, वे महापापी और मिथ्यावादी हैं। वे एक पाप तो जारकर्म का करते हैं और दूसरा मिथ्याभाषण का।

हमारे देशके अनेक तीर्थों में जो कुकर्म होते हैं, उनकी याद आनेसे कठेजा फटने लगता है। हमारी बेचा माँ बहिनों और बेटियोंकी आबरू बचना कठिन हो रहा है। सच तो यह है, दुष्टों ने तीर्थों और मन्दिरोंको इन कुलाडूनाओं को फँसाने का जाल मुकर्कर रखखा है। मोटे-ताज़े वैरागी सन्त और महन्त मुण्त् का बह्रिया-से-बह्रिया माल उड़ाते हैं। इसके बाद जब उन्हें काम-देव सताता है, तब भोली-भाली स्त्रियोंको बहकाकर, उन्हें उल्टी पट्टियाँ पढ़ा कर, उनकी लाज लूटते और उनका सतीत्व भङ्ग करते हैं। घोघाबसन्त भाँड़ लोग ऐसे सएड-मुसएडोंको सब्बा महात्मा समझते हैं। मनमें इतना भी नहीं समझते कि, हमारे लड़ड़ पेड़ें, रबड़ी मलाई, मोहनमोग और खीर पूरी प्रमृति उड़ाने वालोंको क्या काम न सताता होगा ? ये अपनी कामाग्निको किस तरह शान्त करते होंगे ? जब पेड़के पत्ते और हवा खाकर जीवन-निर्वाह करनेवालोंको ही कामदेव सताता है, तब क्या इनको छोड़ देता होगा ? महात्मा भर्तृहरि के कुत्सेसे लोगोंको शिक्षा ग्रहण कर, सावधान रहना चाहिये और स्त्रियोंको तीर्थों या मन्दिरोंमें जानेसे सर्वथा रोकना चाहिये। ये हम भी नहीं कहते: कि, सभी महात्मा और पुजारी कहाने वाले ऐसे कुकर्म करते हैं, पर चूँकि हमने ये दुष्कर्म आँखोंसे देखे हैं, अतः कहना पड़ता है कि, ६६ फी सदी दुष्ट इन कुकर्मोंमें फसे रहते हैं। क्या आप इन्हें विष्वा-

( २१२ )

मित्र और पराशर प्रभृति महर्षियों से भी अधिक इन्द्रिय-विजयी समझते हैं? स्त्री पुरुष—अग्नि और वी, आग और फूँस अथवा चुम्बक पत्थर और लोह के समान हैं। वी और आग के पास-पास होते ही वी पिघलने लगता है। फूँस के पास अग्नि के आते ही फूँसमें भट से आग लग जाती है। चुम्बक के सामने लोहा आते ही, चुम्बक लोहेको अपनी ओर खींचता है। ये नेचरल (Natural) या स्वाभाविक मामले हैं, इनमें मनुष्यका वश नहीं। इसी लिये महात्माओं ने कहा है :—

नारी निरखि न देखिये, निरखि न कीजे दौर।

देखत ही तें विष चढ़े, मन आवे कहु और ॥

सर्व सोनाकी सुन्दरी, आवे बास-सुवास।

जो जननी हो आपनी, तोहू न बैठे पास ॥

स्त्री को कभी घूर कर न देखना चाहिये, उस से आँखें न मिलानी चाहियें। क्योंकि स्त्रीके देखने से ही विष चढ़ता है और फिर मन बिगड़ जाता है।

अगर सुन्दरी सोने की भी हो और उसमें सुगन्ध आ रही हो, यदि वह अपने पैदा करनेवाली महतारी हो, तोभी उसके पास न बैठना चाहिये।

आशा है, हमारे देश के सीधे-सादे लोग इन पंक्तियों पर ध्यान दे, अपने घरोंकी इज्जत-आबरू पर पानी न फिलने देंगे।

( २१३ )

क्षुण्य ।

दुबरो कानौ हीन-श्रवण, विन ॐ नवाये ।

वृद्धौ विकल शरीर, बारविन क्षार लगाये ॥

भरत शीशतें राघ, रुधिर कृमि डारत डोलत ।

लुधा जीण अति दीन, गले घट कण्ठ कलोलत ॥

यह दशा श्वान पाई तज, कृतिधनसे उरुक्त गिरत ।

देखो अनीत या सदनकी, मृतकनको मारत फिरत ॥६३॥

सार—कोई भी प्राणी कामदेवके वाणोंसे

अछूतो बच नहीं सकता ।

63. A dog thin, one-eyed, lame, deaf, without tail, with sores full of puss and worms walking over its body, hungry, old, having the round neck of a broken pot round its shoulder, goes after a bitch for intercourse ; Alas Kamdev ( Cupid ) makes senseless even those who are almost dead. (An animal under the influence of Cupid is devoid of all sense. )

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स्वीमुद्रां भषकेतनस्य परमां सर्वाथसम्पत्कर्मा

ये मृदाः पविहाय यान्ति कुषियो मिथ्याफलान्वेषिणः ॥

तै तैनैव निहत्य निर्दयतरं नमीकृता मुषिङ्गताः

कैचित्यन्वशिखीकृताश्च जटिलाः कापालिकाश्चपरे ॥६४॥

( २१४ )

जो मूर्ख सब अर्थ और सम्पदोंकी देने वाली, कामदेवकी मुद्रारूपी खियोंको लागकर, स्वर्ग प्रभुतिकी इच्छासे, घर छोड़कर निकल गये हैं, उन्हें विरक्त भेषमें न समझना चाहिए। उन्हें कामदेवने अनेक प्रकारके कठोर दण्ड दिये हैं। इसीसे कोई नंगा फिरता है, कोई सिर मुँडाए घूमता है, किसीने पञ्चकेशी रखाई है, किसीने जटा रखाई है और कोई हाथमें ठीकरा लेकर भीख माँगता फिरता है ॥६४॥

खुलासा—खी कामदेव की मुद्रा या मुहर है। जिस तरह राजकी मुद्रा या मुहर का अनादर करनेवाले को राजा अनेक प्रकारके दण्ड देता है; उसी तरह कामदेव भी अपनी खीरूपी मुद्रा का अनादर करनेवालों को नाना प्रकार के दण्ड देता है। किसीको नङ्गा करके फिराता है, तो किसीसे भीख माँगता है।

यही भाव नीचे की कवितामें और भी स्पष्ट रूपसे भल-कता है :—

कुण्डलिया ।

कामिनि मुद्रा कामकी, सकल अर्थको देत । मूरख याकों तजत हैं, भूटे फलके हेत ॥ भूटे फलके हेत, तजत तिनही को ढाँडे । गहि-गहि मूँडे मूँड, बसन बिन कर-कर छाँडे ॥

( २१५ )

भगवा करि-करि मेष, जटिल हवै जागत जामिनि ।

भीख मोंगके खात, कहत हम क्वांडी कामिनि ॥६४॥

सार—स्त्री-त्यागियों को कामदेव नाना प्रकारके दगड देता है ।

64. Those fools, that throw aside the token of king Kamadeva namely the women who are productive of love and all sorts of fortunes, and run after unknown subjects, are cruelly punished by the king Kamadeva, some by being made to roam about naked, some by being made to have their heads shaved, some by being allowed to keep only five bunches of hair on their head and some by being made to beg with a pot in their hand.

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विश्वामित्रपराशरप्रभृतयो वाताम्बुपर्णायना-

स्तेऽपि स्त्रीमुखपंकजं सुतलितं दृष्ट्वैव मोहं गताः ॥

शाल्यननं सद्युतं पयोदधिद्युतं भुञ्जन्ति ये मानवा-

स्तेषामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेद्विन्ध्यस्तेरत्तागरम् ॥६५॥

विश्वामित्र, पराशर, मरीचि और श्रृंगी प्रभृति बड़े-बड़े विद्वान् ऋषि-मुनि, जो वायु-जल और पत्ते खाकर गुजारा करते थे, लीके मुखकमलको देखकर मोहित हो गये ; तब जो मनुष्य अन्न, ची, दूध, दही प्रभृति नाना प्रकारके व्यञ्जन खाते और पीते हैं, कैसे अपनी

( २६ )

इन्द्रियोंको वशमें रख सकते हैं ? यदि वे अपनी इन्द्रियोंको वशमें कर सकें, तो विन्ध्याचल पर्वत भी समुद्रमें तैर सके ॥६॥

खुलासा—कामदेव बड़ा बली है। उसने जब केवल जल, वायु और पत्तो खानेवाले मुनियोंको न छोड़ा ; तब वह घी दूध खाने वालोंको कब छोड़ सकता है ? महामुनि विश्वामित्र जब अपना ज्ञान-ध्यान और विवेक-बुद्धि खोकर स्वर्गीय अप्सरा मेनका की रूपच्छटा पर मुग्ध हो गये ; महर्षि पराशर नाच में बैठे-बैठे अन-जान नाविककी कन्या पर मोहित होगये और हृषा-शर्मको तिला-जलि देकर, दिन-दहाड़े अपनी माया से दिनमें अन्धकार करके, अपनी कामाश्रिकी शान्तिमें मशगूल हो गये ; जब मरीचि और श्रुद्धी जैसे ऋषि वेश्याओंके हाव-भावों पर भर मिटे ; तब साधारण लोग मोहिनियोंकी मोह-पाशसे कैसे बच सकते हैं ? कहा है :—

स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं मुनि मनः

इस पृथ्वी पर स्त्रियोंने किस का मन खण्डित या आकृष्ट नहीं किया ? अर्थात् स्त्रियोंने प्रायः सभी का मन हरा,—सभी के दिलों पर अपनी छाप जमाई।

व्यप्य ।

कौशिकादि मुनि भये, वात-पय-पर्णाहारी । तेहू तित्य-सुख-कमल देख, सब बुद्धि विसारी ॥

( २१० )

दधि श्रुत श्रोदन दूध, मधुर पक्वान मलाई । नित प्रति सेवन करे, रहे बहु मोद बढाई ॥ बहु बिधि ज्ञानी नर जग भए, वे नहि मन कर सके बस । यदि होवहिं तो गिरिबिन्द्य जनु, उदधि मध्य उतराहि तस ॥६४॥

सार—जब विश्वामित्र और पराशर जैसे मुनि स्त्रियोंके माया-जालमें फँस गये, तब और कौन बच सकता है ?

65. Vishwamitra, Parashara and others who lived upon air, water and dry leaves only (they also) became captivated as soon as they saw the charming lotus-like faces of women. Surely then if those who live upon rice mixed with ghee, butter and milk, can be successful in controlling their passions, Vindhya mountains would float on the ocean.

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संसारेऽस्मिन्सारे कुतुपतिश्रुवनद्वारसेवावलम्ब- व्यासंगवस्तवैर्व कथममलवियो मानसं संनिद्धुः॥ यथेतः मोद्यदिन्दुयुतिनिचयश्रुतो न स्युरम्भोजनेत्राः प्रेक्षत्कांचीकलापाः स्तनभरविनमन्मध्यभागास्तस्ययः ॥६६॥

स्त्री-त्यागकी प्रशंसा ।

अगर इस असार संसारमें, पूर्ण चन्द्रमाकी सी कान्तिवाली, कमलकी सी आँखो वाली, कमरमें लटकती हुई कर्चनी पहने वाली,

( २१८ )

स्तनोंके भारसे मुक्की हुई कमर वाली युवती स्त्रियाँ न होतीं, तो निर्मल-बुद्धि मनुष्य, दुष्ट राजाओंके द्वारकी सेवाओंमें, अनेक कष्ट उठाकर अधीर-चित्त क्यों होते ? ॥३३॥

खुलासा—पुरुषों को अपने पेट के लिये, राजा-महाराजाओं और अमीर-उमराओंकी सेवा करके, उनकी टेढ़ी भुकुटियों से हर समय काँपते रहने और बारम्बार अपमानित होने एवं अन्यान्य प्रकार की अनेकों मुसीबतें उठानेकी क्या ज़रूरत थी ? संसार में पुरुष अपनी प्राणप्यारीके लिये ही नाना प्रकारके कष्ट सहता है ; उसी के लिये रणक्षेत्रमें जाकर अपनी गर्दन दे देता है ; उसी के लिये तरह-तरहकी ज़िल्लत और बेइज्ज़ती बर्दाश्त करता है । उसी के सुखकी गरज़से, वह अपने घोर शत्रुओं तक की खुशामदे करके अपने मानको मठीन करता है । बहुत कहना व्यर्थ है, खी ही पुरुषोंके मानमर्दन और दीनता का कारण है ।

छप्पय ।

तौ बसार संसार जान, सन्तोष न तजते । भीर भारके भरे भूषको, मूल न भजते ॥ बुद्धि विवेक निधान, मान अपने नहीं देते । हुकुम विरानो राख, दुःख सम्पद नहीं लेते । जो यह नहीं होती शशि-सुखी, मृगनयनी केहरि कटी । छवि जटी छटा निकसी छरी, रस लपटी छूटी लटी ॥३३॥

( २१६ )

सार—स्त्रियोंके ही कारणसे पुरुषोंको

नाना प्रकार की तकलीफें उठानी पड़ती हैं ।

66. If there would not have been such lotus-eyed young women with face shining like a newly-risen moon, wearing sweet sounding girdle whose waist is bent under the load of breasts, then persons of pure intellect would not have put up with various insults by serving in the courts of wicked kings.

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सिद्धाभ्यासितकन्दरे हरवृषस्कन्धावगाढदुमे

गंगाभौतशिलातले हिमवतः स्थाने स्थिते श्रेयसि ॥

कः कुर्वीत शिरःप्रणामममलिनं म्लानं मनस्वी जनो

यद्विन्नस्तकुर्गंगावनयना न स्युः स्मरास्त्रं स्त्रियः ॥६७॥

यदि त्रस्ता भुगशावकनयनी कामास्त्ररूपा कामिनी इस जगत्में न होती ; तो सिद्ध—महात्माओंकी गुफाओं, महादेवके वाहन—नन्दीश्वर—बैलके कन्धा गढ़नेके वृक्ष और गंगाजलसे पवित्र हुई शिलाओंवाले हिमालयके स्थान छोड़कर, कौन मनस्वी—बुद्धिमान् पुरुष लोगोंके सामने जा, उन्हें माथा झुका, प्रणाम करके, अपने मानको मलिन करता ? ॥६७॥

खुलासा—संसारमें, एकमात्र स्त्री के ही कारणसे, पुरुषों को अनेक तरहसे नीचा देखना पड़ता है । अगर स्त्री न होती, तो