शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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स्तनोंके भारसे मुक्की हुई कमर वाली युवती स्त्रियाँ न होतीं, तो निर्मल-बुद्धि मनुष्य, दुष्ट राजाओंके द्वारकी सेवाओंमें, अनेक कष्ट उठाकर अधीर-चित्त क्यों होते ? ॥३३॥
खुलासा—पुरुषों को अपने पेट के लिये, राजा-महाराजाओं और अमीर-उमराओंकी सेवा करके, उनकी टेढ़ी भुकुटियों से हर समय काँपते रहने और बारम्बार अपमानित होने एवं अन्यान्य प्रकार की अनेकों मुसीबतें उठानेकी क्या ज़रूरत थी ? संसार में पुरुष अपनी प्राणप्यारीके लिये ही नाना प्रकारके कष्ट सहता है ; उसी के लिये रणक्षेत्रमें जाकर अपनी गर्दन दे देता है ; उसी के लिये तरह-तरहकी ज़िल्लत और बेइज्ज़ती बर्दाश्त करता है । उसी के सुखकी गरज़से, वह अपने घोर शत्रुओं तक की खुशामदे करके अपने मानको मठीन करता है । बहुत कहना व्यर्थ है, खी ही पुरुषोंके मानमर्दन और दीनता का कारण है ।
छप्पय ।
तौ बसार संसार जान, सन्तोष न तजते । भीर भारके भरे भूषको, मूल न भजते ॥ बुद्धि विवेक निधान, मान अपने नहीं देते । हुकुम विरानो राख, दुःख सम्पद नहीं लेते । जो यह नहीं होती शशि-सुखी, मृगनयनी केहरि कटी । छवि जटी छटा निकसी छरी, रस लपटी छूटी लटी ॥३३॥