भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २१६ )

सार—स्त्रियोंके ही कारणसे पुरुषोंको

नाना प्रकार की तकलीफें उठानी पड़ती हैं ।

66. If there would not have been such lotus-eyed young women with face shining like a newly-risen moon, wearing sweet sounding girdle whose waist is bent under the load of breasts, then persons of pure intellect would not have put up with various insults by serving in the courts of wicked kings.

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सिद्धाभ्यासितकन्दरे हरवृषस्कन्धावगाढदुमे

गंगाभौतशिलातले हिमवतः स्थाने स्थिते श्रेयसि ॥

कः कुर्वीत शिरःप्रणामममलिनं म्लानं मनस्वी जनो

यद्विन्नस्तकुर्गंगावनयना न स्युः स्मरास्त्रं स्त्रियः ॥६७॥

यदि त्रस्ता भुगशावकनयनी कामास्त्ररूपा कामिनी इस जगत्में न होती ; तो सिद्ध—महात्माओंकी गुफाओं, महादेवके वाहन—नन्दीश्वर—बैलके कन्धा गढ़नेके वृक्ष और गंगाजलसे पवित्र हुई शिलाओंवाले हिमालयके स्थान छोड़कर, कौन मनस्वी—बुद्धिमान् पुरुष लोगोंके सामने जा, उन्हें माथा झुका, प्रणाम करके, अपने मानको मलिन करता ? ॥६७॥

खुलासा—संसारमें, एकमात्र स्त्री के ही कारणसे, पुरुषों को अनेक तरहसे नीचा देखना पड़ता है । अगर स्त्री न होती, तो