भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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पुरुष हिमालय पर्वतकी गुफाओं में अथवा गङ्गा-तट पर किसी उत्तम वृक्षकी छाया में बैठकर, शिव-शिव करता हुआ, अपने दिन सच्ची सुख-शान्तिसे व्यतीत करता । उसे अपनी मान-प्रतिष्ठा खोकर, जने-जने की खूशामद करनेकी कौनसी आवश्यकता थी ? इसमें ज़रा भी शक नहीं कि, संसारमें एकमात्र स्त्री ही के कारण, पुरुष को तरह-तरह की ज़िल्लते उठानी और जगह-जगह बे-इज्जती सहनी पड़ती है ।

कुरङ्गलिया ।

अभय हरिण-शावक-नयन, काम-वाण-सम नार ।

जो घरमें होती नहीं, तो सहजहिं होतों पार ॥

सहजहिं होतों पार, बैठ गिरगुहा सिद्ध बन ।

जहाँ तरुन सों अंग, खुजात फिरै हरवाहन ॥

स्वच्छ फटिक हिम-शैल, तले जहँ वहैं गंगपय ।

निशिदिन धरि हरि-भ्यान, चित्तकै राखिय निर्भय ॥६७॥

सार--स्त्रियोंके कारण ही पुरुषोंको जगह-जगह नीचा देखना पड़ता है ; नहीं तो वन-पर्वतोंमें किस चीजका अभाव है ?

67. If there would not have been women who are the instruments of Kamdeva and who have eyes like those of the fearless young deer, then what high-minded man would have humiliated himself by bowing his head down before men and women, leaving the