शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २१० )
कथः काणः खंजः श्रवणरहितः युच्छविकलो
त्रणी पूयक्लिन्नः कृमिकुलशतैराद्यततः ॥
जुवाचामो जीर्णः पिठरककपालपित्तगलः
शुनीमन्वेति स्वा हतमपि निहन्त्येव मदनः ॥६३॥
काना, लँगड़ा, कनकटा और दुमकटा कुत्ता, जिसके शरीरमें अनेक वाव हो रहे हैं, उनसे पीब और राध करते हैं, दुर्गन्धका ठिकाना नहीं है, वावोंमें हजारोंमें कीड़े पड़े हैं, जो भूखसे व्याकुल हो रहा है और जिसके गलेमें हाँड़ीका घेरा पड़ा हुआ है, कामान्ध होकर कुतियाके पीछे-पीछे दौड़ता है। हाय ! कामदेव बड़ा ही निर्दयी है, जो मेरेको भो मारता है ॥६३॥
खुलासा-कुत्ता इतने क्रूराँसे व्याप्त होने पर भी, शरीर में दम न होने पर भी और क्षुधासे व्याकुल होने पर भी, कामान्ध होकर, कुतिया के पीछे दौड़ता है। इससे स्पष्ट मालूम होता है कि, कामदेव बड़ा ही नीच और निर्दयी है ; क्योंकि वह मुसीबत से भरते हुएों पर भी, अपने सत्यानाशी वाण छोड़ने में आगा-पीछा नहीं करता। जो कामदेव ऐसे दुर्बलों का यह हाल करता है, वह मावा-मलाई घी-दूध और रबड़ी-पेढ़े खाने वाले सण्ड-मुसण्डोंका तो और भी बुरा हाल करता होगा। धूर्त साधू-सन्त और पण्डे-महन्त जो नित्य माल पर माल उड़ाते हैं, क्या काम-वाणोंसे रक्षित रहनेमें समर्थ हो सकते होंगे ? कदापि नहीं।