शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( २११ )
जो ऐसा कहते हैं, वे महापापी और मिथ्यावादी हैं। वे एक पाप तो जारकर्म का करते हैं और दूसरा मिथ्याभाषण का।
हमारे देशके अनेक तीर्थों में जो कुकर्म होते हैं, उनकी याद आनेसे कठेजा फटने लगता है। हमारी बेचा माँ बहिनों और बेटियोंकी आबरू बचना कठिन हो रहा है। सच तो यह है, दुष्टों ने तीर्थों और मन्दिरोंको इन कुलाडूनाओं को फँसाने का जाल मुकर्कर रखखा है। मोटे-ताज़े वैरागी सन्त और महन्त मुण्त् का बह्रिया-से-बह्रिया माल उड़ाते हैं। इसके बाद जब उन्हें काम-देव सताता है, तब भोली-भाली स्त्रियोंको बहकाकर, उन्हें उल्टी पट्टियाँ पढ़ा कर, उनकी लाज लूटते और उनका सतीत्व भङ्ग करते हैं। घोघाबसन्त भाँड़ लोग ऐसे सएड-मुसएडोंको सब्बा महात्मा समझते हैं। मनमें इतना भी नहीं समझते कि, हमारे लड़ड़ पेड़ें, रबड़ी मलाई, मोहनमोग और खीर पूरी प्रमृति उड़ाने वालोंको क्या काम न सताता होगा ? ये अपनी कामाग्निको किस तरह शान्त करते होंगे ? जब पेड़के पत्ते और हवा खाकर जीवन-निर्वाह करनेवालोंको ही कामदेव सताता है, तब क्या इनको छोड़ देता होगा ? महात्मा भर्तृहरि के कुत्सेसे लोगोंको शिक्षा ग्रहण कर, सावधान रहना चाहिये और स्त्रियोंको तीर्थों या मन्दिरोंमें जानेसे सर्वथा रोकना चाहिये। ये हम भी नहीं कहते: कि, सभी महात्मा और पुजारी कहाने वाले ऐसे कुकर्म करते हैं, पर चूँकि हमने ये दुष्कर्म आँखोंसे देखे हैं, अतः कहना पड़ता है कि, ६६ फी सदी दुष्ट इन कुकर्मोंमें फसे रहते हैं। क्या आप इन्हें विष्वा-