भारतकोश
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शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( २११ )

जो ऐसा कहते हैं, वे महापापी और मिथ्यावादी हैं। वे एक पाप तो जारकर्म का करते हैं और दूसरा मिथ्याभाषण का।

हमारे देशके अनेक तीर्थों में जो कुकर्म होते हैं, उनकी याद आनेसे कठेजा फटने लगता है। हमारी बेचा माँ बहिनों और बेटियोंकी आबरू बचना कठिन हो रहा है। सच तो यह है, दुष्टों ने तीर्थों और मन्दिरोंको इन कुलाडूनाओं को फँसाने का जाल मुकर्कर रखखा है। मोटे-ताज़े वैरागी सन्त और महन्त मुण्त् का बह्रिया-से-बह्रिया माल उड़ाते हैं। इसके बाद जब उन्हें काम-देव सताता है, तब भोली-भाली स्त्रियोंको बहकाकर, उन्हें उल्टी पट्टियाँ पढ़ा कर, उनकी लाज लूटते और उनका सतीत्व भङ्ग करते हैं। घोघाबसन्त भाँड़ लोग ऐसे सएड-मुसएडोंको सब्बा महात्मा समझते हैं। मनमें इतना भी नहीं समझते कि, हमारे लड़ड़ पेड़ें, रबड़ी मलाई, मोहनमोग और खीर पूरी प्रमृति उड़ाने वालोंको क्या काम न सताता होगा ? ये अपनी कामाग्निको किस तरह शान्त करते होंगे ? जब पेड़के पत्ते और हवा खाकर जीवन-निर्वाह करनेवालोंको ही कामदेव सताता है, तब क्या इनको छोड़ देता होगा ? महात्मा भर्तृहरि के कुत्सेसे लोगोंको शिक्षा ग्रहण कर, सावधान रहना चाहिये और स्त्रियोंको तीर्थों या मन्दिरोंमें जानेसे सर्वथा रोकना चाहिये। ये हम भी नहीं कहते: कि, सभी महात्मा और पुजारी कहाने वाले ऐसे कुकर्म करते हैं, पर चूँकि हमने ये दुष्कर्म आँखोंसे देखे हैं, अतः कहना पड़ता है कि, ६६ फी सदी दुष्ट इन कुकर्मोंमें फसे रहते हैं। क्या आप इन्हें विष्वा-

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मित्र और पराशर प्रभृति महर्षियों से भी अधिक इन्द्रिय-विजयी समझते हैं? स्त्री पुरुष—अग्नि और वी, आग और फूँस अथवा चुम्बक पत्थर और लोह के समान हैं। वी और आग के पास-पास होते ही वी पिघलने लगता है। फूँस के पास अग्नि के आते ही फूँसमें भट से आग लग जाती है। चुम्बक के सामने लोहा आते ही, चुम्बक लोहेको अपनी ओर खींचता है। ये नेचरल (Natural) या स्वाभाविक मामले हैं, इनमें मनुष्यका वश नहीं। इसी लिये महात्माओं ने कहा है :—

नारी निरखि न देखिये, निरखि न कीजे दौर।

देखत ही तें विष चढ़े, मन आवे कहु और ॥

सर्व सोनाकी सुन्दरी, आवे बास-सुवास।

जो जननी हो आपनी, तोहू न बैठे पास ॥

स्त्री को कभी घूर कर न देखना चाहिये, उस से आँखें न मिलानी चाहियें। क्योंकि स्त्रीके देखने से ही विष चढ़ता है और फिर मन बिगड़ जाता है।

अगर सुन्दरी सोने की भी हो और उसमें सुगन्ध आ रही हो, यदि वह अपने पैदा करनेवाली महतारी हो, तोभी उसके पास न बैठना चाहिये।

आशा है, हमारे देश के सीधे-सादे लोग इन पंक्तियों पर ध्यान दे, अपने घरोंकी इज्जत-आबरू पर पानी न फिलने देंगे।

( २१३ )

क्षुण्य ।

दुबरो कानौ हीन-श्रवण, विन ॐ नवाये ।

वृद्धौ विकल शरीर, बारविन क्षार लगाये ॥

भरत शीशतें राघ, रुधिर कृमि डारत डोलत ।

लुधा जीण अति दीन, गले घट कण्ठ कलोलत ॥

यह दशा श्वान पाई तज, कृतिधनसे उरुक्त गिरत ।

देखो अनीत या सदनकी, मृतकनको मारत फिरत ॥६३॥

सार—कोई भी प्राणी कामदेवके वाणोंसे

अछूतो बच नहीं सकता ।

63. A dog thin, one-eyed, lame, deaf, without tail, with sores full of puss and worms walking over its body, hungry, old, having the round neck of a broken pot round its shoulder, goes after a bitch for intercourse ; Alas Kamdev ( Cupid ) makes senseless even those who are almost dead. (An animal under the influence of Cupid is devoid of all sense. )

—❧—

स्वीमुद्रां भषकेतनस्य परमां सर्वाथसम्पत्कर्मा

ये मृदाः पविहाय यान्ति कुषियो मिथ्याफलान्वेषिणः ॥

तै तैनैव निहत्य निर्दयतरं नमीकृता मुषिङ्गताः

कैचित्यन्वशिखीकृताश्च जटिलाः कापालिकाश्चपरे ॥६४॥

( २१४ )

जो मूर्ख सब अर्थ और सम्पदोंकी देने वाली, कामदेवकी मुद्रारूपी खियोंको लागकर, स्वर्ग प्रभुतिकी इच्छासे, घर छोड़कर निकल गये हैं, उन्हें विरक्त भेषमें न समझना चाहिए। उन्हें कामदेवने अनेक प्रकारके कठोर दण्ड दिये हैं। इसीसे कोई नंगा फिरता है, कोई सिर मुँडाए घूमता है, किसीने पञ्चकेशी रखाई है, किसीने जटा रखाई है और कोई हाथमें ठीकरा लेकर भीख माँगता फिरता है ॥६४॥

खुलासा—खी कामदेव की मुद्रा या मुहर है। जिस तरह राजकी मुद्रा या मुहर का अनादर करनेवाले को राजा अनेक प्रकारके दण्ड देता है; उसी तरह कामदेव भी अपनी खीरूपी मुद्रा का अनादर करनेवालों को नाना प्रकार के दण्ड देता है। किसीको नङ्गा करके फिराता है, तो किसीसे भीख माँगता है।

यही भाव नीचे की कवितामें और भी स्पष्ट रूपसे भल-कता है :—

कुण्डलिया ।

कामिनि मुद्रा कामकी, सकल अर्थको देत । मूरख याकों तजत हैं, भूटे फलके हेत ॥ भूटे फलके हेत, तजत तिनही को ढाँडे । गहि-गहि मूँडे मूँड, बसन बिन कर-कर छाँडे ॥

( २१५ )

भगवा करि-करि मेष, जटिल हवै जागत जामिनि ।

भीख मोंगके खात, कहत हम क्वांडी कामिनि ॥६४॥

सार—स्त्री-त्यागियों को कामदेव नाना प्रकारके दगड देता है ।

64. Those fools, that throw aside the token of king Kamadeva namely the women who are productive of love and all sorts of fortunes, and run after unknown subjects, are cruelly punished by the king Kamadeva, some by being made to roam about naked, some by being made to have their heads shaved, some by being allowed to keep only five bunches of hair on their head and some by being made to beg with a pot in their hand.

—❧—

विश्वामित्रपराशरप्रभृतयो वाताम्बुपर्णायना-

स्तेऽपि स्त्रीमुखपंकजं सुतलितं दृष्ट्वैव मोहं गताः ॥

शाल्यननं सद्युतं पयोदधिद्युतं भुञ्जन्ति ये मानवा-

स्तेषामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेद्विन्ध्यस्तेरत्तागरम् ॥६५॥

विश्वामित्र, पराशर, मरीचि और श्रृंगी प्रभृति बड़े-बड़े विद्वान् ऋषि-मुनि, जो वायु-जल और पत्ते खाकर गुजारा करते थे, लीके मुखकमलको देखकर मोहित हो गये ; तब जो मनुष्य अन्न, ची, दूध, दही प्रभृति नाना प्रकारके व्यञ्जन खाते और पीते हैं, कैसे अपनी

( २६ )

इन्द्रियोंको वशमें रख सकते हैं ? यदि वे अपनी इन्द्रियोंको वशमें कर सकें, तो विन्ध्याचल पर्वत भी समुद्रमें तैर सके ॥६॥

खुलासा—कामदेव बड़ा बली है। उसने जब केवल जल, वायु और पत्तो खानेवाले मुनियोंको न छोड़ा ; तब वह घी दूध खाने वालोंको कब छोड़ सकता है ? महामुनि विश्वामित्र जब अपना ज्ञान-ध्यान और विवेक-बुद्धि खोकर स्वर्गीय अप्सरा मेनका की रूपच्छटा पर मुग्ध हो गये ; महर्षि पराशर नाच में बैठे-बैठे अन-जान नाविककी कन्या पर मोहित होगये और हृषा-शर्मको तिला-जलि देकर, दिन-दहाड़े अपनी माया से दिनमें अन्धकार करके, अपनी कामाश्रिकी शान्तिमें मशगूल हो गये ; जब मरीचि और श्रुद्धी जैसे ऋषि वेश्याओंके हाव-भावों पर भर मिटे ; तब साधारण लोग मोहिनियोंकी मोह-पाशसे कैसे बच सकते हैं ? कहा है :—

स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं मुनि मनः

इस पृथ्वी पर स्त्रियोंने किस का मन खण्डित या आकृष्ट नहीं किया ? अर्थात् स्त्रियोंने प्रायः सभी का मन हरा,—सभी के दिलों पर अपनी छाप जमाई।

व्यप्य ।

कौशिकादि मुनि भये, वात-पय-पर्णाहारी । तेहू तित्य-सुख-कमल देख, सब बुद्धि विसारी ॥

( २१० )

दधि श्रुत श्रोदन दूध, मधुर पक्वान मलाई । नित प्रति सेवन करे, रहे बहु मोद बढाई ॥ बहु बिधि ज्ञानी नर जग भए, वे नहि मन कर सके बस । यदि होवहिं तो गिरिबिन्द्य जनु, उदधि मध्य उतराहि तस ॥६४॥

सार—जब विश्वामित्र और पराशर जैसे मुनि स्त्रियोंके माया-जालमें फँस गये, तब और कौन बच सकता है ?

65. Vishwamitra, Parashara and others who lived upon air, water and dry leaves only (they also) became captivated as soon as they saw the charming lotus-like faces of women. Surely then if those who live upon rice mixed with ghee, butter and milk, can be successful in controlling their passions, Vindhya mountains would float on the ocean.

—*—

संसारेऽस्मिन्सारे कुतुपतिश्रुवनद्वारसेवावलम्ब- व्यासंगवस्तवैर्व कथममलवियो मानसं संनिद्धुः॥ यथेतः मोद्यदिन्दुयुतिनिचयश्रुतो न स्युरम्भोजनेत्राः प्रेक्षत्कांचीकलापाः स्तनभरविनमन्मध्यभागास्तस्ययः ॥६६॥

स्त्री-त्यागकी प्रशंसा ।

अगर इस असार संसारमें, पूर्ण चन्द्रमाकी सी कान्तिवाली, कमलकी सी आँखो वाली, कमरमें लटकती हुई कर्चनी पहने वाली,

( २१८ )

स्तनोंके भारसे मुक्की हुई कमर वाली युवती स्त्रियाँ न होतीं, तो निर्मल-बुद्धि मनुष्य, दुष्ट राजाओंके द्वारकी सेवाओंमें, अनेक कष्ट उठाकर अधीर-चित्त क्यों होते ? ॥३३॥

खुलासा—पुरुषों को अपने पेट के लिये, राजा-महाराजाओं और अमीर-उमराओंकी सेवा करके, उनकी टेढ़ी भुकुटियों से हर समय काँपते रहने और बारम्बार अपमानित होने एवं अन्यान्य प्रकार की अनेकों मुसीबतें उठानेकी क्या ज़रूरत थी ? संसार में पुरुष अपनी प्राणप्यारीके लिये ही नाना प्रकारके कष्ट सहता है ; उसी के लिये रणक्षेत्रमें जाकर अपनी गर्दन दे देता है ; उसी के लिये तरह-तरहकी ज़िल्लत और बेइज्ज़ती बर्दाश्त करता है । उसी के सुखकी गरज़से, वह अपने घोर शत्रुओं तक की खुशामदे करके अपने मानको मठीन करता है । बहुत कहना व्यर्थ है, खी ही पुरुषोंके मानमर्दन और दीनता का कारण है ।

छप्पय ।

तौ बसार संसार जान, सन्तोष न तजते । भीर भारके भरे भूषको, मूल न भजते ॥ बुद्धि विवेक निधान, मान अपने नहीं देते । हुकुम विरानो राख, दुःख सम्पद नहीं लेते । जो यह नहीं होती शशि-सुखी, मृगनयनी केहरि कटी । छवि जटी छटा निकसी छरी, रस लपटी छूटी लटी ॥३३॥

( २१६ )

सार—स्त्रियोंके ही कारणसे पुरुषोंको

नाना प्रकार की तकलीफें उठानी पड़ती हैं ।

66. If there would not have been such lotus-eyed young women with face shining like a newly-risen moon, wearing sweet sounding girdle whose waist is bent under the load of breasts, then persons of pure intellect would not have put up with various insults by serving in the courts of wicked kings.

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सिद्धाभ्यासितकन्दरे हरवृषस्कन्धावगाढदुमे

गंगाभौतशिलातले हिमवतः स्थाने स्थिते श्रेयसि ॥

कः कुर्वीत शिरःप्रणामममलिनं म्लानं मनस्वी जनो

यद्विन्नस्तकुर्गंगावनयना न स्युः स्मरास्त्रं स्त्रियः ॥६७॥

यदि त्रस्ता भुगशावकनयनी कामास्त्ररूपा कामिनी इस जगत्में न होती ; तो सिद्ध—महात्माओंकी गुफाओं, महादेवके वाहन—नन्दीश्वर—बैलके कन्धा गढ़नेके वृक्ष और गंगाजलसे पवित्र हुई शिलाओंवाले हिमालयके स्थान छोड़कर, कौन मनस्वी—बुद्धिमान् पुरुष लोगोंके सामने जा, उन्हें माथा झुका, प्रणाम करके, अपने मानको मलिन करता ? ॥६७॥

खुलासा—संसारमें, एकमात्र स्त्री के ही कारणसे, पुरुषों को अनेक तरहसे नीचा देखना पड़ता है । अगर स्त्री न होती, तो

( २२० )

पुरुष हिमालय पर्वतकी गुफाओं में अथवा गङ्गा-तट पर किसी उत्तम वृक्षकी छाया में बैठकर, शिव-शिव करता हुआ, अपने दिन सच्ची सुख-शान्तिसे व्यतीत करता । उसे अपनी मान-प्रतिष्ठा खोकर, जने-जने की खूशामद करनेकी कौनसी आवश्यकता थी ? इसमें ज़रा भी शक नहीं कि, संसारमें एकमात्र स्त्री ही के कारण, पुरुष को तरह-तरह की ज़िल्लते उठानी और जगह-जगह बे-इज्जती सहनी पड़ती है ।

कुरङ्गलिया ।

अभय हरिण-शावक-नयन, काम-वाण-सम नार ।

जो घरमें होती नहीं, तो सहजहिं होतों पार ॥

सहजहिं होतों पार, बैठ गिरगुहा सिद्ध बन ।

जहाँ तरुन सों अंग, खुजात फिरै हरवाहन ॥

स्वच्छ फटिक हिम-शैल, तले जहँ वहैं गंगपय ।

निशिदिन धरि हरि-भ्यान, चित्तकै राखिय निर्भय ॥६७॥

सार--स्त्रियोंके कारण ही पुरुषोंको जगह-जगह नीचा देखना पड़ता है ; नहीं तो वन-पर्वतोंमें किस चीजका अभाव है ?

67. If there would not have been women who are the instruments of Kamdeva and who have eyes like those of the fearless young deer, then what high-minded man would have humiliated himself by bowing his head down before men and women, leaving the

श्रद्धाशक्त

यदि जगत् में कामिनी न होती, तो महादेव के बाहन नन्दी के कन्या रगड़ने के वृक्षों और गंगाजल से पवित्र हुई शिलाओं वाले हिमालयके स्थान छोड़ कर, कौन मनस्वी पुरप लोगों के सामने जा, उन्हें सिर-भुका, अपने मान को मलिन करता ? (पृ० १६०)

Popular Press—Calcutta.

A high-contrast, black and white photograph of a blank white page. The page is held open by a hand, with the thumb and part of the index finger visible on the left side, gripping the edge of the paper. The paper itself is mostly white with some minor scanning artifacts, such as small dark specks and faint vertical lines near the left edge. The background at the bottom of the frame is dark, suggesting the book's cover or the underside of the page.

( २२१ )

blissful region of the Himalayas in whose caves pious men reside and where the bull of God Shiva rubs his shoulder against the trees and where the mountain slabs are washed by the water of the Ganges.

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संसार तव निस्तारपदवी न दीयीसी ।

अन्तरा दुस्तरा न सूर्यदिरे मदिरेचाणाः । १३ ॥

हे संसार ! यदि तुममें मदसे मतवाले नेत्रोंवाली दुस्तरा स्त्रियाँ न होतीं, तो तेरे परली पार जाना कुछ कठिन न होता ॥१३॥

खुलासा—मनुष्य इस लोकमें, कर्म-बन्धन या जन्म-मरणकी फाँसीसे पीछा छुड़ानेकी लिय आता है। मोक्षकी साधना के लिये ही, उसे मनुष्य-देहरूपी पारसमणि मिलती है कि, वह नियत अवधि के भीतर, उससे मोक्षरूपी सोना बना ले। पर, यहाँ आने पर, उसका वचपन तो खेल-कूद और पढ़ने-लिखनेमें कट जाता है। यौवनावस्था आने पर वह चञ्चलनयनी, उन्नत-नितम्बिनी, पीनपयोधरा कामिनियों के रूप-जालमें फँस जाता है। इनमें वह ऐसा भूलता है, कि उसकी सारी उग्र बीत जाती है और उसे अपने कर्त्तव्य-कर्मकी याद तक नहीं आती। इतने में ही उसकी अवधि पूरी हो जाती है और उससे पारसमणि रूपी मनुष्य-देह छिन जाती है ; यहाँसे वह मोक्षरूपी सोना बनाये बिना ही,

( २२२ )

फिर कोरा चला जाता है। तात्पर्य यह कि, कामिनियोंके कारण से मनुष्य इस संसार-सागरसे पार नहीं हो सकता। उसके इस काममें वे बाधा डालती हैं। सब है, संसारमें यदि कामिनी और काञ्चन न होते, तो फिर किसीको भी इस भव-सागरके पार करनेमें कठिनाई न होती। रसिक कवि ने पू्व कहा है—

दोहा ।

जो होती नहिं नार, मदभाती मृगलोचनी । जगकेपरलीपार, गमन न दुर्लभ कहुक था ॥

सोरठा ।

जो नहिं होती नार, तो तरिबौ जगमें सुगम । यह लींबी तरवार, मार लेत अथबीचही ॥

सार--संसार-सागरसे पार होनेमें, नेत्रोंसे जादू करनेवाली सुन्दरी स्त्रियाँ ही बाधा- स्वरूप हैं ।

68. O world, it would not have been very difficult to cross you if there were not this great obstacle in the form of woman having beautiful eyes.

—*

( २२३ )

यौवन-प्रशंसा ।

राजस्तुष्णांबुराशेन हि जगति गतः कश्चिदेवावसानं को वाऽर्थोऽर्थैः प्रभूतैः स्ववपुषि गलिते यौवने सादुरागे ॥ गच्छामः सद्म यावद्विकसितनयनेन्दीवरालोकिनीनामा- कम्याकम्य रूपं भटिति न जरया लुप्यते प्रेयसीनाम् ॥१६॥

हे महाराज ! इस तृष्णा-रूपी समुद्रके पार कोई न जा सका । अतीव प्यारी यौवनावस्थाके चले जाने पर, अधिक धन-सञ्चयसे क्या लाभ होगा ! हम शीघ्र ही अपने घर क्यों न चले जायें , क्योंकि, कहीं ऐसा न हो कि, विकसित कुमुद और कमलके समान नेत्रोंवाली हमारी प्यारियोंके रूपको वृद्धावस्था घुला-घुलाकर विगाड़ डाले ॥१६॥

खुलासा—राजन् ! तृष्णा-पिशाचिनीका अन्त नहीं । यह दिन-दिन बढ़ती ही जाती है । हज़ार होने पर लाख की, लाख होने पर करोड़ की और करोड़ होने पर अरब-खरब की अथवा साम्राज्यकी इच्छा होती है । मनुष्य बूढ़ा हो जाता है, उसके बाल पक जाते हैं, दाँत गिर जाते हैं ; पर तृष्णा न बूढ़ी होती है और न उसका कोई अङ्ग क्षीण होता है । वह तो बढ़ती ही जाती है । किसी ने कहा है :—

( २२४ )

निःस्वः वष्टि शतं शती दशशतं लक्षं सहस्राधिपो, लक्षेशः क्षितिपालतां क्षितिपतिश्चक्रेशतां वाञ्छति । चक्रेशः पुनरिन्द्रतां सुरपतिर्ब्राह्मणं वाञ्छति, ब्रह्मा शिवपदं शिवो हरिपदं आशावर्धि को गतः ? ॥

निर्धन सौ रुपये चाहता है, सौ वाला दश हजार चाहता है, और हजारपति लाख रुपये चाहता है, लखपति राजा होना चाहता है, राजा सम्राट् होना चाहता है, सम्राट् इन्द्र होना चाहता है, इन्द्र ब्रह्मा होना चाहता है, ब्रह्मा शिव होना और शिवजी विष्णु होना चाहते हैं। किस की आकांक्षा का शेष हुआ है ? मतलब यह, आज तक कोई भी इस तृष्णा-नदी के पार न जा सका। क्या हम इस के पार पहुँच सकते हैं ? हरगिज नहीं। तब हम क्यों इस पिशाचिनीके फेर में पड़कर, अपनी जवानी को बर्बाद करें ; क्योंकि जवानी एक बार जाकर फिर नहीं आती ? महा- कवि दाग ने कहा है :—

रहती है कब वहारे जवानी, तमाम उम्र । मानिन्द वृये गुल, इधर आई उधर गई ॥ जो जाकर न आये, वह जवानी देखी । जो आकर न जाये, वह बुढ़ापा देखा ॥

जवानी की बहार सारी उम्र कहाँ रहती है ? वह तो फूलोंकी खुराबू की तरह इधर आती है और उधर चली जाती है।

( २२५ )

जवानी तो जाकर फिर नहीं आती और बुढ़ापा आकर फिर नहीं जाता ।

और भी किसी हिन्दी-कवि ने कहा है—

सदा न फूले तोरई, सदा न सावन होय ।

सदा न जीवन थिर रहे, सदा न जीवे कोय ॥

अगर तृष्णा के फेर में पड़े रहनेसे, इधर हमारी जवानी चली गई और उधर हमारी प्राणप्यारी की जवानी चली गई ; तो हमारे धन जमा करनेसे क्या लाभ होगा ? हमने अपनी आज्ञादी इसी लिये खोई है कि, हम धन कमाकर, घरमें जा, अपनी नवयुवती का यौवन-सुख भोगें ; पर हमारे एक इसी धुनमें लगे रहने से सब चौपट हो जायगा । इसलिये हमें शीघ्र ही घर जाना चाहिये और जवानी के, प्रातःकालीन दीपक के समान, निस्तेज होने से पहले, अपनी प्राणवल्लभाकी उठती जवानीका आनन्द उपभोग करना चाहिये । क्योंकि यदि हम प्रवासमें रहें और प्यारी हमारे पास न रहे—हम से दूर रहे ; तो हमारा धन और हमारी जवानी दोनों ही वृथा हैं । ऐसी जवानी और ऐसी दौलतसे कोई लाभ नहीं । किसी ने कहा है :—

वितेन किं ? वितरणं यदि नास्ति दीने,

किं सेवया ? यदि परोपकृतौ न यत्नः ।

किं संगमेन ? तनयो यदि नेच्छाधीयः,

किं यौवनेन ? विरहो यदि वल्लभायाः ॥

१५

( २२६ )

अगर ग़रीब और मुहताज़ों को धन न दिया जाय, तो धन के होनेसे क्या लाभ ? वह धन निष्फल है । यदि पराया उपकार न किया जाय, तो सेवा निष्फल है । जिस स्त्री-संगम से पुत्र न पैदा हो, वह स्त्री-संगम वृथा है । यदि प्यारो के साथ जुदाई हो, तो जवानी वृथा है । ऐसी जवानी से क्या फ़ायदा ? सारांश यह है, कि जब स्त्री-पुरुष दोनों ही जवान हों, तभी काम-श्रीङ्गाका आनन्द है । बुढ़ापेमें क्या रक्खा है ? स्त्री-भोगका आनन्द जवानीमें ही है ; क्योंकि जवानीमें ही बदनमें ताकत रहती है और जवानीमें ही कामदेवका जोश रहता है । अगर स्त्रीका यौवन उतार पर आजाय, उसके स्तन सिङ्गुड़ जायँ वा धैलेसे लट्कने लगेँ, तब क्या आनन्द है ? उस समय स्त्री उल्टी बुरी लगती है । जो मज़ा है, वह नवीना नारीमें ही है । कहा हैः—

नववस्त्रं नवच्छत्रं नव्या स्त्री नूतनं गृहम् ।

सर्वत्र नूतनं शस्तं सेवकाभिः पुरातनं ॥

सब देशोंमें नया कपड़ा, नया छाता, नयी स्त्री और नया घर—ये अच्छे समझे जाते हैं । केवल नौकर और अन्न ये पुराने अच्छे समझे जाते हैं । कहा हैः—

शशी दिवसधूसरो गलितयौवना कामिनी, सरो विगतवारिजं मुखमनहारं स्वाकृतेः ।

( २२७ )

प्रसुर्वनपरायणः सततदुर्गतः सज्जनो ।

रुपाङ्गगगगतःखलो मनसि सप्तशल्यानि मे ॥

दिनका मलिन चन्द्रमा, क्षीणयौवन कामिनी, बिना कमलों का तालाब, सुन्दर सुरतवाला निरक्षर—पूर्व, धनका लोभी स्वामी, दरिद्री सज्जन और राजसभामें दुष्ट—ये सात मेरे हृदयमें कटि की तरह खटकते हैं ।

सारंश यह है कि, सब काम अपने-अपने समय पर अच्छे लगते और अपना फल देते हैं। खेती सूख जाने पर बरसनेसे क्या लाभ ? समय पर चूरू कर, पीछे पछतानेसे क्या फायदा ? पानी आ जानेपर मेंड बाँधनेसे क्या प्रयोजन ? आग लग जाने पर, कुआँ खोदनेसे क्या मतलब ? नदी आजाने पर बन्धा बाँधने और बुढ़ापा आजाने पर शादी करनेसे क्या लाभ ? नीतिमें लिखा है :—

( १ )

निर्वाण दीपे किमु तैलदानं

चौरंगते वा किमु सावधानम् ।

वयोगते किं वनिता-विलासः

पयोगते किं खलु सेतुबन्धः ॥

( २ )

शीतेऽतीते वसनमशनं बासरान्ते निशान्ते

जीडारम्भः कुवल्यदृशां यौवनान्ते विवाहः ॥

( २२८ )

सेतोर्वन्धः पयसि गलिते प्रस्थिते लघ्वचिन्ता सर्वञ्चैतद्भवति विफलं स्वस्वकाले व्यतीते ॥

दीपक बुभ्रु जाने पर तेल डालनेसे क्या ? चोरके माल ले जाने पर सावधानीसे क्या ? जवानी चली जानेपर बनिता-बिहार से क्या ? जलके चले जाने पर पुल बाँधनेसे क्या ? ॥१॥

जाड़ा चला जाने पर कपड़े पहननेसे क्या ? सर्फ हो जाने पर भोजन करनेसे क्या ? रात बीत जाने पर नीलकमलोंके समान नेत्रोंवाली स्त्रियोंके साथ प्रसङ्ग करनेसे क्या ? जवानी चली जाने पर विवाह करनेसे क्या ? जलके चले जानेपर पुल बाँधनेसे क्या ? प्रस्थान कर देने पर, लघ्व-चिन्तासे क्या ? अर्थात् ये सब अपना-अपना समय बीतने पर निष्फल हैं ॥२॥

बुढ़ापमें चौदह-चौदह और सोलह-सोलह बरसकी उठती जवानीकी कामिनियोंके साथ जो ना-समभ बूढ़े 'खुरांट' विवाह करते हैं ; वे इस श्लोकसे शिक्षा ग्रहण करें । क्या सिरसका फूल हीरोंमें छेद कर सकता है ? ऐसे अशर्मियोंकी इस लोकमें बदनामी होती और परलोकमें उन्हें भयंकर दण्ड मिलता है ! इन की खिरियाँ इनके लात मार कर, या तो कहाँ और रसोईयोंसे आशनाई करतीं अथवा साईस और कोचवानोंके साथ भाग जाती हैं । हाँ, कोई-कोई कलियुगी पतिव्रता, अपने बूढ़े-बालम को, बिना ज़रासा भी कष्ट दिये, संत-मेंतमें पुत्रव्रत देकर, उसके कुलका नाम चला देती अथवा वंशको डूबनेसे बचा लेती है ।