भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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जवानी तो जाकर फिर नहीं आती और बुढ़ापा आकर फिर नहीं जाता ।

और भी किसी हिन्दी-कवि ने कहा है—

सदा न फूले तोरई, सदा न सावन होय ।

सदा न जीवन थिर रहे, सदा न जीवे कोय ॥

अगर तृष्णा के फेर में पड़े रहनेसे, इधर हमारी जवानी चली गई और उधर हमारी प्राणप्यारी की जवानी चली गई ; तो हमारे धन जमा करनेसे क्या लाभ होगा ? हमने अपनी आज्ञादी इसी लिये खोई है कि, हम धन कमाकर, घरमें जा, अपनी नवयुवती का यौवन-सुख भोगें ; पर हमारे एक इसी धुनमें लगे रहने से सब चौपट हो जायगा । इसलिये हमें शीघ्र ही घर जाना चाहिये और जवानी के, प्रातःकालीन दीपक के समान, निस्तेज होने से पहले, अपनी प्राणवल्लभाकी उठती जवानीका आनन्द उपभोग करना चाहिये । क्योंकि यदि हम प्रवासमें रहें और प्यारी हमारे पास न रहे—हम से दूर रहे ; तो हमारा धन और हमारी जवानी दोनों ही वृथा हैं । ऐसी जवानी और ऐसी दौलतसे कोई लाभ नहीं । किसी ने कहा है :—

वितेन किं ? वितरणं यदि नास्ति दीने,

किं सेवया ? यदि परोपकृतौ न यत्नः ।

किं संगमेन ? तनयो यदि नेच्छाधीयः,

किं यौवनेन ? विरहो यदि वल्लभायाः ॥

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