शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २२४ )
निःस्वः वष्टि शतं शती दशशतं लक्षं सहस्राधिपो, लक्षेशः क्षितिपालतां क्षितिपतिश्चक्रेशतां वाञ्छति । चक्रेशः पुनरिन्द्रतां सुरपतिर्ब्राह्मणं वाञ्छति, ब्रह्मा शिवपदं शिवो हरिपदं आशावर्धि को गतः ? ॥
निर्धन सौ रुपये चाहता है, सौ वाला दश हजार चाहता है, और हजारपति लाख रुपये चाहता है, लखपति राजा होना चाहता है, राजा सम्राट् होना चाहता है, सम्राट् इन्द्र होना चाहता है, इन्द्र ब्रह्मा होना चाहता है, ब्रह्मा शिव होना और शिवजी विष्णु होना चाहते हैं। किस की आकांक्षा का शेष हुआ है ? मतलब यह, आज तक कोई भी इस तृष्णा-नदी के पार न जा सका। क्या हम इस के पार पहुँच सकते हैं ? हरगिज नहीं। तब हम क्यों इस पिशाचिनीके फेर में पड़कर, अपनी जवानी को बर्बाद करें ; क्योंकि जवानी एक बार जाकर फिर नहीं आती ? महा- कवि दाग ने कहा है :—
रहती है कब वहारे जवानी, तमाम उम्र । मानिन्द वृये गुल, इधर आई उधर गई ॥ जो जाकर न आये, वह जवानी देखी । जो आकर न जाये, वह बुढ़ापा देखा ॥
जवानी की बहार सारी उम्र कहाँ रहती है ? वह तो फूलोंकी खुराबू की तरह इधर आती है और उधर चली जाती है।