शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २२३ )
यौवन-प्रशंसा ।
राजस्तुष्णांबुराशेन हि जगति गतः कश्चिदेवावसानं को वाऽर्थोऽर्थैः प्रभूतैः स्ववपुषि गलिते यौवने सादुरागे ॥ गच्छामः सद्म यावद्विकसितनयनेन्दीवरालोकिनीनामा- कम्याकम्य रूपं भटिति न जरया लुप्यते प्रेयसीनाम् ॥१६॥
हे महाराज ! इस तृष्णा-रूपी समुद्रके पार कोई न जा सका । अतीव प्यारी यौवनावस्थाके चले जाने पर, अधिक धन-सञ्चयसे क्या लाभ होगा ! हम शीघ्र ही अपने घर क्यों न चले जायें , क्योंकि, कहीं ऐसा न हो कि, विकसित कुमुद और कमलके समान नेत्रोंवाली हमारी प्यारियोंके रूपको वृद्धावस्था घुला-घुलाकर विगाड़ डाले ॥१६॥
खुलासा—राजन् ! तृष्णा-पिशाचिनीका अन्त नहीं । यह दिन-दिन बढ़ती ही जाती है । हज़ार होने पर लाख की, लाख होने पर करोड़ की और करोड़ होने पर अरब-खरब की अथवा साम्राज्यकी इच्छा होती है । मनुष्य बूढ़ा हो जाता है, उसके बाल पक जाते हैं, दाँत गिर जाते हैं ; पर तृष्णा न बूढ़ी होती है और न उसका कोई अङ्ग क्षीण होता है । वह तो बढ़ती ही जाती है । किसी ने कहा है :—